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महिलाओं के खतने का मामला संविधान पीठ को

नई दिल्ली। एक खास मुस्लिम समुदाय की महिलाओं का खतना किए जाने के खिलाफ दायर याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने संविधान पीठ के सामने भेज दिया है। गौरतलब है कि दाऊदी बोहरा मुस्लिमों में महिलाओं के खतना की प्रथा प्रचलित है। इसको चुनौती देने वाली याचिका को सर्वोच्च अदालत ने सोमवार को पांच जजों की एक संविधान पीठ को भेज दी।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने दाऊदी बोहरा वीमन्स एसोसिएशन फॉर रिलीजियस फ्रीडम, डीबीडब्ल्यूआरएफ की दलीलों पर विचार किया कि महिलाओं के खतना की प्रथा दाऊदी बोहरा समुदाय में सदियों से है और इसकी वैधता का परीक्षण एक बड़ी पीठ को करना चाहिए कि क्या यह अनिवार्य धार्मिक प्रथा है, जो संविधान के तहत संरक्षित है।

केंद्र की ओर से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने सरकार के पुराने रुख को दोहराया था कि वह इस प्रथा के खिलाफ है क्योंकि इससे मौलिक अधिकारों का हनन होता है। उन्होंने कहा था कि यह अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और करीब 27 अफ्रीकी देशों में प्रतिबंधित है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 25 का भी जिक्र किया था, जिसमें कहा गया है कि अगर कोई धार्मिक प्रथा लोक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के खिलाफ जाती है तो इसे रोका जा सकता है।

वेणुगोपाल ने एफजीएम की प्रथा के खिलाफ दिल्ली की वकील सुनीता तिवारी की जनहित याचिका को पांच जजों की संविधान पीठ के पास भेजने की डीबीडब्यूआरएफ की दलीलों का समर्थन किया। डीबीडब्ल्यूआरफ का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी कर रहे थे। अदालत ने केंद्र समेत पक्षकारों के लिखित कथन पर विचार किया और कहा कि वह याचिका को पांच सदस्यीय संविधान पीठ के पास भेजने के लिये आदेश देगी।

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