तो जनता ने खड़ा किया विपक्ष!

मानो देश ने चैन की सांस ली! लोगों का भरोसा लौटा। हिम्मत बंधी! सचमुच ताजा चुनाव के नतीजों के बाद देश का झलका मनोभाव अद्भुत है। सब इस मूड में हैं कि अच्छा जो चौतरफा दौड़ते अहंकार के सांड़ों के सींग जनता ने पकड़े! उनके आगे विपक्ष जिंदा किया! जान लें कांग्रेस और विपक्ष का सपने में ख्याल नहीं था कि जनता उसे प्राणायाम कराएगी। हां, जनता ने खुद कांग्रेस, एनसीपी, हुड्डा, शरद पवार, सोनिया गांधी को खड़ा किया! यह प्रमाण है कि मोदी-शाह झूठ-प्रोपेगेंडा से सवा सौ करोड़ लोगों को गुलाम बनाने का जो रोडमैप लिए हुए हैं उसकी उम्र कांग्रेस के पंडित नेहरू के उन 15 सालों जितनी भी नहीं है जब कांग्रेस हर प्रांत लगातार जीतती थी!

वैसे भारत इन दिनों भक्ति और शक में सांसें ले रहा है। सन् 2014 से भारत की राजनीति में एक पाला भक्ति का है तो दूसरा ईवीएम पर शक का है। दोनों में बुद्धि गिरवी रखी हुई है। सोचें, गुरूवार को विधानसभा चुनाव के नतीजे आए तो देशव्यापी मोटा मनोभाव क्या था? सब हैरान थे कि मोदी-शाह की आंधी क्यों नहीं? ऐसी बहस उन टीवी चैनलों में थी जो भक्त श्रेणी के हैं। इसका अर्थ है कि मोदी-शाह-भाजपा-संघ का वैभव तभी तक है जब तक सत्ता का सूरज है। फिर तो वे ही टीवी चैनल, मीडिया, सोशल मीडिया इन्हें लिंच करेंगे, जिनसे ये आरती सुन रहे हैं।

दूसरा मतलब है कि नरेंद्र मोदी ने पूरी पार्टी, पूरी विचारधारा, हिंदू राजनीति, संघ के गोर्वधन पर्वत को अपनी ऊंगली पर उठा कर सबको जैसे गुलाम बनाया है वह उनके हटते ही बालू के टीले की तरह ढह पड़ेगा। जो है वह मोदी की ऊंगली है। बाकी सब जीरो अपील वाले। विजय रूपाणी, खट्टर, फड़नवीस, रघुवर दास और केंद्रीय कैबिनेट के तमाम चेहरे बेमतलब।

तीसरी बात डबल इंजन का शासन देने की जुमलेबाजी में मोदी-शाह ने भाजपा के तमाम मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों, पदाधिकारियों में अहंकार का वह संस्कार बनवाया है, जिसके चलते साकार-निराकार तमाम चेहरे और उनके दफ्तर घमंड-लापरवाही के ठिकाने बने हैं। इन ठिकानों में विश्वास है कि मोदीजी, प्रोपेगेंडा जीता देगा तो बाकी चिंता नहीं। ये जनता के काम, लोगों के काम करने-कराने का नहीं, बल्कि मोदीजी-शाहजी को खुश करने, उनके घमंड को अपना आदर्श बनाने की प्रवृत्ति बना बैठे हैं तभी हरियाणा में रामविलास शर्मा, ओपी धनकड़, कैप्टन अभिमन्यु जैसों या महाराष्ट्र में पंकजा मुंडे जैसों का हारना अहंकार की हार है।

चौथी बात महाराष्ट्र और हरियाणा ने बताया है कि भाजपा के वोट मतलब हवा है और जैसे कांग्रेस 1952 से 1967 के पंद्रह साल ब्राह्मण, दलित-आदिवासी, मुसलमान (ये समूह अभी भी कांग्रेस से किसी न किसी रूप में अपनापन पाते हैं।) के ठोस आधार में निरंतर राज में रही वैसा कोई भी आधार मोदी-शाह की हुकूमत में संघ परिवार का नहीं बन रहा है। मराठा, जाट, पिछड़ी-मझोली जातियां-मध्य वर्ग और युवाओं को कितना ही पटा लो सभी हवा के साथी हैं। झूठ-प्रोपेगेंडा की हवा जब तक चलेगी तक तक ये साथ। और झूठ का भांडा फूटा, असली चेहरा सामने आया तो विरोधी की तब जो हवा चलेगी तब आज के हवा वाले वोट हवा-हवाई हो कर, पाला बदलेंगे। राजनीति भाजपा नेताओं को लिंच करने वाली बनेगी।

पांचवीं बात शक याकि ईवीएम की राजनीति पर कुछ विराम। हां, मैं ईवीएम मशीन से अखिल भारतीय स्तर पर, इतने बड़े देश में धांधली हो सकना संभव नहीं मानता। लेकिन मैं मानो अकेला! सभी विपक्षी नेता, विरोधी लोग हर दिन दलील देते हुए समझाते हैं कि आपको समझ नहीं! मेरा मानना है कि मोदी-शाह के सोशल मीडिया लंगूरों ने भी ईवीएम मशीन का हल्ला बना कर विपक्ष का मनोबल तोडा है। ताजा चुनावों में हरियाणा में भाजपा के एक नेता ने जो कहा कि कुछ भी कर लो, जीतेंगे हम क्योंकि मोदीजी-शाहजी ने सब व्यवस्था की हुई है तो मोटे तौर वह विपक्ष के मनोबल को तोड़ने की रणनीति से था।

हां, समझें इस बात को कि मोदी-शाह ने पहले दिन से कांग्रेस-सपा-बसपा याकि विपक्ष की लड़ने लायक मनोदशा पर टारगेट किया हुआ है। मतलब कुछ भी करें हम जीतेंगें। कुछ भी हो जाए सरकार हम ही बनाएंगे। राहुल गांधी तो पप्पू है। विपक्ष में चेहरा कौन है? विपक्ष में कोई जीता भी तो उसे तोड़ लेंगे। विपक्ष की कहीं सरकार बनी तो जब चाहें तोड़ लेंगे। हुड्डा तो जेल जा रहे हैं, शरद पवार-प्रफुल्ल पटेल, अखिलेश, मायावती तो फंसे हुए हैं, हेमंत सोरेन, केजरीवाल क्या खाक मुकाबला करेंगे। विपक्ष आपस में लड़ कर वोट कटवा लेगा।

यह सब लड़ाई के मनोवैज्ञानिक नुस्खे हैं। हुड्डा पर ऐन वक्त तक तलवार लटका कर राहुल-सोनिया को भी उलझाए रखा ताकि हुड्डा को वे हरियाणा की कमान दें या नहीं!

इसमें हिम्मत और हौसला तोड़ने वाली अहम बात ईवीएम मशीन से गड़बड़ी की चर्चा है। विपक्ष का हर नेता, उम्मीदवार यहीं बात करता है कि ईवीएम मशीन का क्या करें? मई 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद हर कोई यह समझाने की कोशिश करता रहा कि ईवीएम की धांधली से ऐसा नतीजा आया। एक जानकार ने चुनाव के तुंरत बाद मई में सूरत के एक कोचिंग सेंटर में लगी भयावह आग को धांधली से जोड़ कर लंबी चौड़ी थीसिस दी। रूस के हैकर ऑपरेशन चलाए हुए हैं आदि आदि।

तभी विपक्षी नेताओं का दिमाग ईवीएम से भी अपंग बना हुआ है। विपक्ष का मनोविज्ञान अधर में है। वह शक करता है पर आंदोलन नहीं करता। तभी शक की सामूहिक एक राय के बावजूद ईवीएम की बजाय मतपत्र से वोटिंग का विपक्ष ने आंदोलन नहीं बनाया। आंदोलन की याकि जैसे लोकसभा से ही विपक्ष के इस्तीफे हो जाएं या जब तक मतपत्र नहीं चुनाव के बहिष्कार का सर्वविपक्ष रूख बने तो सरकार कितनी ही ताकतवर हो उसे विचार करना पड़ेगा। पर विपक्ष का मनोबल तोड़ा हुआ है।

बहरहाल, अपना मानना है कि अनुच्छेद 370 के बावजूद बगल के हरियाणा में राष्ट्रवाद की हवा मंद हुई तो यह विपक्ष के लिए सबक है कि ईवीएम का राग छोड़े और अपने आपको खड़ा करने के लिए संघर्ष करे, हल्ला बोल सच्चा विपक्ष बने! शायद इससे विपक्ष अब खौफ, आंतक, दबिस और सरेंडर की मनोदशा से बाहर निकले। चुनाव का निचोड़ है कि कांग्रेस को, विपक्ष के एनसीपी-कांग्रेस एलायंस को जनता ने जिंदा किया। हुड्डा, चिदंबरम, शिवकुमार, अजित पवार, शरद पवार, प्रफुल्ल पटेल आदि से मोदी सरकार ने कांग्रेस को, एनसीपी को दस तरह से बदनाम किया बावजूद इसके हुड्डा के लिए, कांग्रेस के लिए, एनसीपी के लिए लोग तमाम प्रतिकूल स्थितियों के बावजूद वोट देने को निकले तो बेसिक बात है कि सवा सौ करोड़ लोगों में कांग्रेस, विपक्ष मरेगा नहीं जिंदा रहेगा। बस, जरूरत कांग्रेस के, विपक्ष के हौसले की है।

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