अयोध्या का सत्य कयामत तक

मुस्लिम समाज के प्रतिनिधि संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना सैय्यद अरशद मदनी ने एक वाक्य में सबकुछ कह दिया। उनका कहा हिंदू का भी सत्य है और मुसलमान का भी तो भारत राष्ट्र-राज्य, भारतीय समाज-संस्कृति का सत्व भी है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट के फैसला मतलब इतिहास की महज एक घटना। महज एक व्याख्या, एक व्यवस्था होगी। उससे न इतिहास के घाव भरने हैं और न भविष्य के फफोड़ों की कीमियोथेरेपी होनी है। फैसला कुछ भी हो हिंदू और मुसलमान की आस्था का वह द्वंद्व यथावत रहेगा जो सदियों से चला आ रहा है। इसलिए क्योंकि मसला आस्था के साथ धर्म, कौम की जीत और हार की दिल-दिमाग की गांठ का है।

इस बहुत बेबाकी से, सटीक अंदाज में मौलाना असद मदनी ने इस वाक्य से बताया है कि अयोध्या में 400 साल से बाबरी मस्जिद थी और कयामत तक मस्जिद ही रहेगी। फिर भले सत्ता और ताकत के दम पर उसे कोई भी स्वरूप क्यों न दिया जाए!

मदनी ने इसके साथ कहा कि सुप्रीम कोर्ट जो भी फैसला देगा हम उसका दिल से सम्मान करेंगे। हमने अपने सबूत रखे। हमने कानून के एतबार से केस लड़ा। हमने तमाम सबूतों को मजबूती से रखा। बावजूद इसके कोर्ट सबूतों को कानूनी एतबार से रद्द करते हुए फैसला देता है तो उसका सम्मान करेंगे लेकिन उसे धर्म की नजर से नहीं देखेंगे। मतलब सत्ता, ताकत और उसके कानून में फैसला कुछ भी हो वह वक्त के साथ बनता-बिगड़ता है लेकिन धर्म और आस्था का जो ख्याल है तो उसमें कयामत तक मस्जिद ही रहेगी।

यह बात हिंदू पर भी लागू होती है तो मुसलमान पर भी लागू होती है। अयोध्या, काशी और मथुरा के हिंदू आस्था केंद्रों पर यह बात लागू है तो इजराइल के येरूसलेम में यहूदी-मुसलमान-ईसाई के आस्था केंद्र यथा अल-अक्सा मसजिद, वेलिंग वॉल, टेंपल माउंट के झगड़ों पर भी लागू है।

इजराइल में भी कयामत याकि पृथ्वी के नष्ट होने, प्रलय तक आस्था के संर्घष का मनोभाव रहना है तो अयोध्या, काशी और मथुरा को ले कर भी रहना है। इतिहास गवाह है कि वक्त का जो सिकंदर होता है उसकी जीत दूसरे की हार होती है और जो जीतता है वह अपनी आस्था की मस्जिद या मंदिर या चर्च बनाता है जबकि पराजित पक्ष के मंदिर या मस्जिद, चर्च का ध्वंस होता है।

यह अयोध्या मसले पर अपनी सनातनी व्याख्या है। मैं क्योंकि 1983 से मंदिर आंदोलन का गवाह रहा हूं, लगातार लिखता रहा हूं इसलिए 6 दिसंबर के जिस दिन बाबरी मस्जिद का ध्वंस हुआ था उस दिन भी अपना मानना था कि सबकुछ आस्था व इतिहासजन्य ग्रंथी से है। गांधी-नेहरू की गलती थी जो धर्म के आधार पर मुसलमान के लिए पाकिस्तान बनने दिया लेकिन हिंदुओं के लिए बने हिंदुस्तान में हिंदू इतिहास के घावों को भरने के लिए हिंदू आस्था केंद्रों की मुक्ति का फैसला नहीं किया। यदि दूरदृष्टि, हिम्मत से तभी सोमनाथ की तरह अयोध्या का फैसला हुआ होता तो दोनों समुदायों के परस्पर रिश्तों का वह अनुभव नहीं बनता जो 72 सालों में हुआ है!

अयोध्या का सत्य है कि हिंदुओं ने कभी उसे नहीं भुलाया। हिंदू की जनश्रुति में सदा-सनातनी वह राम का जन्मस्थान रहा। तभी विजेता मुस्लिम बादशाहों के निशाने का भी वह इतिहास है। मसजिद बनी तो जब-जब भी मौका बना या मिला तो हिंदू मानस आस्था की जगह मत्था टेकने पहुंचा, उसमें मंदिर की हूंक बनी। इसलिए अयोध्या का संर्घष दोनों पक्षों के लिए इतिहास की वह दास्तां हो गई है जिसमें मौलाना मदनी ने ठीक कहा कि कयामत तक मसला रहेगा। मुसलमानों के लिए मसजिद के रूप में तो हिंदू के लिए मंदिर के रूप में!

तभी लाख टके का सवाल है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या मसले का अंत याकि पटाक्षेप होगा? नहीं, कतई नहीं! फैसला किसी के लिए जीत होगी, किसी की हार होगी या विवाद को और उलझाने वाला होगा! तभी अपना तर्क रहा है कि यह मामला कानून, अदालत से नहीं बल्कि राष्ट्र-राज्य की राजनैतिक लीडरशीप को लोगों की आस्था, भावना और उसके इतिहास को तौलते हुए आजादी के तुरंत बाद गांधी-नेहरू को सुलटाना था। उन्हंे तब समझ दिखलानी थी कि जिन लोगों से देश बनता है उनकी भावनाओं, उनकी आस्थाओं, उनकी बुनावट को इतिहास की दृष्टि से हैंडल करना है या नहीं?

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