नीतीश और भाजपा को एक-दूसरे की चिंता

दो राज्यों- महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनाव के नतीजों और बिहार की पांच विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजों ने राजनीतिक और चुनावी परिदृश्य को बदला है। लोकसभा चुनाव के बाद बिहार में नीतीश कुमार के खिलाफ आक्रामक तेवर दिखा रहे भाजपा नेताओं के सुर नरम पड़ गए हैं। उनको लग रहा है कि जहां भाजपा ने पहले अकेले सरकार बनाई थी वहां उसे सहयोगियों की जरूरत पड़ गई है तो जहां कभी भाजपा अकेले नहीं जीती वहां उसकी क्या स्थिति होगी! ध्यान रहे हरियाणा और महाराष्ट्र दोनों जगह भाजपा की सीटें घटी हैं। लोकसभा के मुकाबले हरियाणा में तो भाजपा का वोट 23 फीसदी घट गया। सो, बिहार भाजपा के नेताओं की चिंता बढ़ी है।

दूसरी ओर नीतीश कुमार के लिए भी बहुत जोश में आने वाली बात नहीं है। यह सही है कि दो राज्यों में भाजपा का राष्ट्रीय मुद्दा या नरेंद्र मोदी और अमित शाह का चमत्कार उस तरह से नहीं चला है, जैसे पहले चल रहा था। पर बिहार के उपचुनाव में नीतीश कुमार का जादू भी नहीं चला है। बिहार में पांच सीटों पर उपचुनाव हुए थे, जिनमें चार पर जनता दल यू और एक पर भाजपा लड़ी थी। इनमें से सिर्फ एक सीट एनडीए को मिली। बेलहर की एक सीट पर जैसे तैसे जदयू का उम्मीदवार जीता। बाकी चार में से दो सीटें राजद को मिलीं, एक असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एमआईएम और एक सीट निर्दलीय के खाते में गई। यह एनडीए के लिए तो झटका था ही निजी तौर पर नीतीश कुमार के लिए बड़ा झटका था। आखिर पांच महीने पहले लोकसभा चुनाव में एनडीए ने राज्य की 40 में से 39 सीटें जीती हैं।

सो, कहा जा सकता है कि बिहार में भाजपा और जदयू का हिसाब बराबर है। महाराष्ट्र व हरियाणा में भाजपा का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक अच्छा नहीं रहा तो बिहार में नीतीश कुमार को लेकर भी मोहभंग का माहौल है। ऐसे में दोनों सहयोगी पार्टियां एक दूसरे के साथ शह और मात का खेल खेलेंगी। नीतीश कुमार की पार्टी के नेता बयानों के जरिए भाजपा पर मनोवैज्ञानिक दबाव बना रहे हैं कि विधानसभा चुनाव में जदयू ज्यादा सीटों पर लड़ेगी। ध्यान रहे पहले जदयू ज्यादा सीटों पर लड़ती थी। लेकिन तब तालमेल सिर्फ दो पार्टियों- भाजपा और जदयू का होता था। अब रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा भी उसमें शामिल है।

अगर लोकसभा चुनाव के सीट बंटवारे का फार्मूला चलेगा तो जदयू और भाजपा एक-एक सौ सीट पर लड़ेंगे और बाकी 43 सीटें लोजपा को मिलेंगी। इस फार्मूले में दो-चार सीटों से ज्यादा का ऊपर-नीचे नहीं होगा। पर जदयू के नेता ज्यादा सीट लड़ना चाहते हैं ताकि चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पद के लेकर किसी तरह की चिंता न रहे। उनके ध्यान में महाराष्ट्र का मामला है, जहां भाजपा की सीटें घटीं तो शिव सेना ने सीएम पद की दावेदारी शुरू कर दी थी। ऐसे ही अगर बिहार में दोनों पार्टियां बराबर सीटों पर लड़ी और चुनाव नतीजों में भाजपा को ज्यादा सीट आ गई तो उसके नेता भी मुख्यमंत्री पद की मांग शुरू कर देंगे। तभी नीतीश कुमार अभी से ऐसी पोजिशनिंग कर रहे हैं कि उन्हें ज्यादा सीटें मिलें। इसी मकसद से उन्होंने राम जेठमलानी के निधन से खाली हुई राज्यसभा की सीट भाजपा के लिए छोड़ी।

अभी तक की स्थिति में जनता दल यू बेहतर पोजिशन में है। अमित शाह ने भी कह दिया है कि बिहार में एनडीए नीतीश कुमार के चेहरे पर ही चुनाव लड़ेगी। पर यह कहने की बात है। जनता दल यू के नेता इसे अंतिम तयशुदा नहीं मान रहे हैं। इसलिए वे अकेले लड़ने की या एक अलग गठबंधन बना कर लड़ने की तैयारी भी कर रहे हैं। नीतीश कुमार बिहार के मुस्लिम नेताओं को अपनी पार्टी में भरती कर रहे हैं। उन्हें भरोसा है कि वे राजद के समीकरण में से मुस्लिम निकाल लेंगे और अति पिछड़ी जातियों व महादलित के साथ सवर्ण को मिला कर जीतने वाला समीकरण बना सकते हैं। परंतु अगर भाजपा की ओर से ज्यादा सीटों की मांग नहीं हुई तो जदयू की ओर से भी तालमेल तोड़ने की बात शायद ही हो। यह सब कुछ अगले कुछ दिन में होने वाले दो राज्यों के चुनाव नतीजों पर निर्भर करेगा और इस बात पर भी निर्भर करेगा कि अयोध्या में क्या हो रहा है।

झारखंड और दिल्ली में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। इसी बीच 17 नवंबर तक राम जन्मभूमि में जमीन विवाद का फैसला आना है। फैसले के बाद अगर मंदिर का निर्माण शुरू हो गया तो इसका बड़ा असर होगा। खास कर बिहार के चुनाव में। अगर झारखंड और दिल्ली में भाजपा का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक रहा तो उसका भी असर होगा। इससे भाजपा नेताओं का मनोबल भी प्रभावित होगा और तब बिहार का राजनीतिक समीकरण बदलेगा।

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