भाजपा का मोमेंटम टूटा!

मतलब कड़ाव का ऊबाल ठंडा हुआ! हरियाणा, महाराष्ट्र के चुनाव नतीजों और उसके बाद मोदी-शाह-भाजपा का कुल रुख और राजनीति की दशा में जो सर्दपन दिखा है उससे सवाल बना है कि आगे क्या? क्या झारखंड और दिल्ली में भी चुनावमोदी के करिश्मे और शाह की रणनीति पर पानी फेरने वाले होंगे? क्या नीतीश कुमार अब मोदी-शाह के लिए मजबूरी हो गए है? नीतीश कुमार की शर्तों पर भाजपा बिहार में चुनाव लड़ेगी?

हिसाब से राष्ट्रवाद, धारा-370 खत्म होने, अयोध्या के मंदिर फैसले, एनआरसी आदि मुद्दों पर काम को देखते हुए पूरे देश में पुलवामा बाद से बड़ी सुनामी बनी होनी चाहिए। अयोध्या में दीपावली पर दीपोत्सव का जैसा अखिल भारतीय प्रचार हुआ या धारा-370 खत्म होनेका जो चमत्कार था उससे घर-घर भाजपा के दीये जले हुए होने चाहिए थे लेकिन मैं दिल्ली में रहता हूं और अरविंद केजरीवाल का हल्ला सुनाई दे रहा है!

तभी आम माहौल में चर्चा है कि मोदी-शाह के राष्ट्रवाद अलाव की आंच मंद हुई है। कड़ाव के ऊबाल पर हरियाणा, महाराष्ट्र के नतीजों का पानी छिटंका है। भाजपा का खटके से हर चुनाव जीतते जाने का मोमेंटम टूटा है। हरियाणा और महाराष्ट्र दोनों में राजनीति बदली हुई है। भाजपा के नए मुख्यमंत्रियों की भी धमक पहले टर्म जैसी नहीं होगी। दबाव में काम करना होगा!

इसलिए लाख टके का सवाल है कि मोदी-शाह ने चुनाव नतीजों का क्या अर्थ निकाला होगा? अपना मानना है कि कोई खास नहीं। ये अपने हिंदू एजेंडे को ले कर आश्वस्त हंै। आर्थिकी, मंदी और बेरोजगारी ने भले लोगों के घरों में चिंता बना रखी हो लेकिन मोदी-शाह को विश्वास है कि जरूरत होगी तो हिंदू कड़ाव में पुलवामा बाद की तरह का ऊबाल फिर बनवाना मुश्किल नहीं होगा! राज्यों के चुनाव से क्योंकि दिल्ली की सत्ता को कोई खतरा नहीं है तो राज्यों के चुनाव में जैसा होता है वैसा होता रहे। प्रदेश के चुनावों के लिए करिश्मा और चुनावी रणनीति वाली मशीनरी और तिलिस्म पर्याप्त है। इनसे नतीजे भले वैसे छप्पर फाड़ नहीं आए लेकिन विपक्ष चुनौती नहीं बनेगा। महाराष्ट्र में कुछ भी हो जाए उद्धव ठाकरे शरणागत होंगे। नीतीश कुमार शरणागत रहेंगे। अरविंद केजरीवाल मर्यादित रहेंगे!

मतलब मोदी-शाह का आत्मविश्वास हिला हो या चिंता में हो, यह नहीं सोचा जाना चाहिए! बावजूद इसके भाजपा के बम-बम होने, वाहवाही के मोमेंटम में तो कमी है।

एक वजह नरेंद्र मोदी और अमित शाह का अपने आपको अंधेरी गुफा में पाना भी है! इन्हें खुद समझ नहीं आ रहा होगा कि अब क्या, आगे क्या? जम्मू-कश्मीर में धारा-370 खत्म हो गई? दो केंद्र शासित प्रदेश बने गए लेकिन कश्मीर घाटी को कैसे सामान्य बनाए? पाकिस्तान, चीन, सऊदी अरब, अमेरिका सबको हैंडल करते -करते कितना हैंडल करें? यही स्थिति आर्थिकी में है? क्या करें जिससे सुस्ती, मंदी की हवा खत्म हो? असम में नागरिकता रजिस्टर बन गया, 19 लाख विदेशी चिंहित हो गए तो उनका आगे क्या? दिल्ली की सत्ता, नौकरशाही, गर्वनेंस में सबकुछ अपना है, चौबीसों घंटे मेहनत है, अपने आपको सुपर एक्टीव दिखलाया जा रहा है, भारत में काम करना आसान हुआ, यह भी हल्ला हो गया बावजूद इसके बात क्या बन रही? विदेशी निवेशक कहां आ रहे हैं? भारत का निवेशक, भारत के बैंकों की क्या गतिविधियां है? सो सब है पर ऊबाल खत्म और मोमेंटम उलटे मंदी बढ़ाने का, बेरोजगारी बढ़वाने का, अनिश्चय-आंशकाओं को बढ़वाने वाला!

मौटे तौर पर जमीनी स्तर पर, राज्यों में वह बैचेनी, वे परेशानियां है जिन पर राष्ट्रवाद के जुमलों, मुद्दों और फैसलों का असर घटता जा रहा है।

तो क्या माना जाए कि जम्मू-कश्मीर, अनुच्छेद-370, अयोध्या में मंदिर, एनआरसी आदि का लगातार हल्ला अंततः बासी होने लगेगा और वक्त के साथ स्थानिय राजनीति पर प्रदेशों के आगे चुनाव होंगे? जवाब देना मुश्किल है। इसलिए क्योंकि मोदी-शाह इस कला के अनुभवी है कि वक्त की जरूरत पर भारत बनाम पाकिस्तान, हिंदू बनाम मुस्लिम करके भेड़-बकरियों को हांका जाता है!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares