झारखंड और दिल्ली में पहली परीक्षा

भाजपा ने महाराष्ट्र और हरियाणा की अपनी सरकार बचाने का चुनाव राष्ट्रवाद के मुद्दे पर लड़ा था। हर सभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का और यहां तक कि दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों का भाषण भी राष्ट्रवाद के मुद्दे पर ही रहा। देवेंद्र फड़नवीस और मनोहर लाल खट्टर भी अनुच्छेद 370 के नाम पर वोट मांग रहे थे। इन दोनों राज्यों ने पूरी तरह से तो नहीं पर आंशिक रूप से इस मुद्दे की हवा निकाल दी। अब आगे झारखंड और दिल्ली की परीक्षा होनी है।

इन दोनों राज्यों में अनुच्छेद 370, तीन तलाक, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर का मुद्दा तो होगा ही संभव है कि दो बड़े भावनात्मक मुद्दे और जुड़ जाएं। संभव है कि अगले महीने शुरू हो रहे संसद के शीतकालीन सत्र में केंद्र सरकार नागरिकता कानून पास कराए और पड़ोसी देशों से प्रताड़ित होकर आने वाले सभी हिंदुओं को नागरिकता देने का ऐलान करे। यह बड़ा ऐलान होगा। इसी बीच 17 नवंबर से पहले सुप्रीम कोर्ट से राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद के भूमि विवाद का फैसला आ जाएगा। इसके बाद हर हाल में मंदिर निर्माण शुरू होना है। अगर अदालत के फैसले से हुआ तो ठीक नहीं तो सरकार दखल देगी। तभी उत्तर प्रदेश भाजपा के नेता और विश्व हिंदू परिषद के पदाधिकारी मंदिर निर्माण शुरू होने की तारीख बता रहे हैं।

तभी दिल्ली और झारखंड में भाजपा के नए एजेंडे की परीक्षा होनी है और दोनों राज्यों की भाजपा विरोधी पार्टियों की भी परीक्षा होनी है। ध्यान रहे पांच साल पहले दिल्ली में अरविंद केजरीवाल ने ही भाजपा का विजय रथ रोका था। लोकसभा चुनाव और राज्यों की जीत के बाद पहली बार नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी दिल्ली में हारी थी। जनवरी 2015 में केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने भाजपा को बुरी तरह से हराया था। दिल्ली की 70 में से सिर्फ तीन सीटें भाजपा जीत पाई थी। पांच साल सरकार चलाने के बाद अरविंद केजरीवाल की परीक्षा होनी है।

पिछली बार केजरीवाल ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर चुनाव लड़ा था। इस बार भी वे ईमानदार सरकार का नारा दे रहे हैं पर उन्होंने पांच साल के अपने कामकाज को भी मुद्दा बनाया है। फ्री बिजली, पानी, मुफ्त में अच्छी शिक्षा व स्वास्थ्य और दिल्ली की बसों में महिलाओं की मुफ्त यात्रा जैसी अनेक योजनाएं हैं, जिनसे केजरीवाल को दोबारा जीत की उम्मीद है। निश्चित रूप से लोकसभा चुनाव ने उनको चिंता में डाला होगा। दिल्ली की सात में से पांच सीटों पर उनकी पार्टी तीसरे नंबर पर चली गई थी। कांग्रेस दूसरे स्थान पर रही। ध्यान रहे कांग्रेस और आप का वोट बैंक लगभग एक जैसा है। इसलिए यह देखने वाली बात होगी कि ये दोनों पार्टियां दिल्ली में किस तरह से राजनीति करती हैं।

विपक्ष की असली परीक्षा झारखंड में होनी है। वहां झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस और झारखंड विकास मोर्चा तीन मुख्य विपक्षी पार्टियां हैं। दूसरी ओर भाजपा और उसकी सहयोगी आजसू है। विपक्षी पार्टियां लोकसभा में एक साथ मिल कर लड़ी थीं। इसके बावजूद नतीजे पहले जैसे ही रहे। राज्य की 14 में से 12 सीटों पर भाजपा जीती। पांच महीने के बाद ही विधानसभा चुनाव से पहले विपक्षी पार्टियों का गठबंधन बिखरा हुआ है। लालू प्रसाद की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल दो हिस्सों में बंट गया है और किसी को पता नहीं है कि कौन सा हिस्सा किस पार्टी के साथ जा रहा है।

कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा में तालमेल की चर्चा है। पर झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता हेमंत सोरेन इस जिद पर अड़े हैं कि उनको मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करके चुनाव लड़ा जाए। वे आदिवासी बनाम गैर आदिवासी की लड़ाई बनाना चाहते हैं। पर यह दांव अंततः भाजपा को फायदा पहुंचाने वाला साबित होगा। असल में हेमंत सोरेन और कांग्रेस दोनों ने मान लिया है कि अब भाजपा की स्थिति कमजोर हो गई है और नरेंद्र मोदी व अमित शाह का जादू उतार पर है। वे पांच साल की केंद्र व राज्य की एंटी इन्कंबैंसी के भरोसे खुद को सत्ता में आया हुआ मान रहे हैं। इसलिए पहले ही मुख्यमंत्री का पद सुरक्षित कराना चाहते हैं। यह जिद विपक्ष की राजनीति पर भारी पड़ेगी। दूसरी बाबूलाल मरांडी अलग एक तीसरा मोर्चा बनाने में लगे हैं, जिसमें नीतीश कुमार और ममता बनर्जी की पार्टी भी हो सकती है। इन सभी पार्टियों को भी लग रहा है कि दो राज्यों के चुनाव नतीजे के बाद भाजपा बैकफुट पर है और लोग उससे जवाब मांग रहे हैं। पर हेमंत सोरेन या बाबूलाल मरांडी में से कोई भी वैसा करने को तैयार नहीं है, जैसा शरद पवार ने महाराष्ट्र में किया। अपने हितों को छोड़ कर मजबूत गठबंधन बना कर ही विपक्ष भाजपा का मुकाबला कर सकता है।

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