डंडे का भय ज्यादा नहीं चलेगा

भारतीय जनता पार्टी ने महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव से पहले डंडे का भय दिखाया था, जैसे वह देश के अलग अलग हिस्सों में दिखाती रही है। चुनाव से ऐन पहले एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल को दाऊद इब्राहिम के करीबी से जमीन के सौदे के एक कथित मामले में नोटिस भेजा गया और ईडी ने पूछताछ शुरू की। सिंचाई घोटाले में अजित पवार को घेरा गया और अति उत्साह में शरद पवार को भी ईडी की ओर से नोटिस जारी कर दिया गया। शिव सेना के नेता एकनाथ शिंदे को भी केंद्रीय एजेंसियों की ओर से नोटिस भेजा गया। डंडा चलाने की यह राजनीति ही भाजपा को भारी पड़ गई। इससे शिव सेना और एनसीपी में दोनों ने गांठ बांधी कि पहला मौका मिलते ही भाजपा को सबक सिखाना है।

सो, शरद पवार और उद्धव ठाकरे ने पहला मौका मिलते ही भाजपा को झटका दिया। हैरानी नहीं होगी अगर दूसरा झटका कर्नाटक में लगे, जहां ईडी की हिरासत से छूट कर गए कांग्रेस नेता डीके शिवकुमार 15 सीटों के उपचुनाव की कमान संभाल रहे हैं। पश्चिम बंगाल में तो पार्टी को झटका लगा ही है। तीन सीटों के उपचुनाव में तीनों पर तृणमूल कांग्रेस जीती है। पार्टी अपने प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष की खाली की हुई खड़गपुर सदर सीट पर 20 हजार से ज्यादा वोट से हारी, जबकि इसी लोकसभा सीट से घोष सांसद चुने गए हैं। बिहार में भी लालू प्रसाद को जेल में बंद रखने के बावजूद नौ सीटों के उपचुनाव में से तीन पर राजद को जीत मिली थी।

असल में केंद्रीय एजेंसियों के जरिए डंडा चलाने की राजनीति का अब उलटा असर हो रहा है। झारखंड में किसी के ऊपर इस डर का असर नहीं हुआ। पहले कहा जा रहा था कि हेमंत सोरेन केंद्रीय एजेंसियों की जांच के डर से कांग्रेस से तालमेल नहीं करेंगे। पर उन्होंने तालमेल किया। यह भी कहा जा रहा था कि भाजपा की सहयोगी आजसू डर कर आठ-नौ सीटों पर तालमेल कर लेगी। उसके नेता सुदेश महतो को डराने के लिए दिल्ली भी बुलाया गया था पर वे 17 सीटों की सूची देकर चले गए और कहा कि इन सहमति बनती है तो वे साथ रहेंगे। सहमति नहीं बनी तो वे अकेले लड़ रहे हैं।

यह भी समझने वाली बात है कि हर पार्टी चाहे वह छोटी है या बड़ी उसका अपना एक वोट बैंक है। उसका कोर वोट है और उसके समर्थक हैं। वे भी इस बात से आहत हैं कि भाजपा उनके नेता का अपमान कर रही है। महाराष्ट्र में शिव सैनिकों ने इसे महसूस किया तो उत्तर प्रदेश में भी सुहेलदेव पार्टी के नेता राजभर के समर्थकों ने महसूस किया है। पश्चिम बंगाल में ममता समर्थक इसे महसूस कर रहे हैं हरियाणा में हुड्डा समर्थकों ने महसूस किया और भाजपा को सबक सिखाया। नेता को डरा कर, उन्हें कमजोर करने की यह राजनीति असल में अब सबको एकजुट कर रही है और उनको मजबूत कर रही है। महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड तीनों इसकी मिसाल हैं। अगर भाजपा इस राजनीति को नहीं छोड़ती है तो आगे और भी कई मिसालें देखने को मिल सकती हैं। उसकी इसी राजनीति का नतीजा है कि उसके पास अब सिर्फ दो बड़े सहयोगी और तीन बड़े राज्य बचे हैं। जहां उसकी सहयोगी पार्टियों की संख्या 41 थी वहां अब गिनती की पार्टियां साथ रह गई हैं और जहां 71 फीसदी भारत पर भाजपा का राज था वहां अब वह घट कर 40 फीसदी पर आ गया है।

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