महाराष्ट्र में कर्नाटक जैसा संभव नहीं

भाजपा के नेता खम ठोक के कह रहे हैं कि महाराष्ट्र में अभी निर्णायक फैसला नहीं हुआ है। यह राउंड जरूर भाजपा विरोधी पार्टियों ने जीत लिया है पर अंतिम जीत भाजपा की होगी। अपनी इस बात के समर्थन में वे कर्नाटक की मिसाल दे रहे हैं। ध्यान रहे महाराष्ट्र में काफी हद तक कर्नाटक की कहानी दोहराई गई है। वहां भी पहले सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते भाजपा ने दावा किया और मुख्यमंत्री वजू भाईवाला ने बीएस येदियुरप्पा को शपथ दिला दी। उनको भी बहुमत साबित करने के लिए 14 दिन का समय मिला था पर सुप्रीम कोर्ट ने उसे घटा कर एक दिन कर दिया। ऐसा ही महाराष्ट्र में भी हुआ। राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने देवेंद्र फड़नवीस को आधी रात के एक ऑपरेशन के बाद तड़के शपथ दिला दी और 14 दिन का समय दे दिया। जब सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत साबित करने का समय घटाया तो जैसे कर्नाटक में येदियुरप्पा ने इस्तीफा दिया था वैसे ही महाराष्ट्र में फड़नवीस ने दे दिया।

कर्नाटक में दो पार्टियों- कांग्रेस और जेडीएस ने मिल कर सरकार बनाई और महाराष्ट्र में शिव सेना, एनसीपी और कांग्रेस ने मिल कर सरकार बनाई है। इसी की मिसाल देकर भाजपा के नेता कह रहे हैं कि जैसे अंत में कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस की सरकार गिरी और भाजपा ने अपनी सरकार बनाई वैसे ही महाराष्ट्र में भी गठबंधन की सरकार गिर जाएगी और भाजपा सरकार बना लेगी। पर यह भाजपा नेताओं की सदिच्छा से ज्यादा और कुछ नहीं है। दोनों राज्यों के राजनीतिक घटनाक्रम में ऊपर बताई गई समानताओं के बावजूद इतनी असमानताएं हैं कि भाजपा ने कर्नाटक में जो किया उसे महाराष्ट्र में दोहराना नाममुकिन नहीं तो मुश्किल बहुत होगा।

दोनों राज्यों में पहली असमानता तो संख्या में है। कर्नाटक की 224 सदस्यों की विधानसभा में भाजपा ने 104 सीटें जीती थीं और उसे सरकार बनाने के लिए सिर्फ नौ विधायकों की जरूरत थी। तभी कांग्रेस और जेडीएस के 17 विधायकों के इस्तीफे करा कर भाजपा ने अपनी सरकार बना ली। 17 विधायकों के इस्तीफे से विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 104 का हो गया और इतनी सीटें अकेले भाजपा के पास हैं। हालांकि पांच दिसंबर को 15 सीटों पर हो रहे उपचुनाव में अगर भाजपा का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं होता है तो राज्य में फिर अस्थिरता बढ़ सकती है।

बहरहाल, इसके उलट महाराष्ट्र की 288 सदस्यों की विधानसभा में भाजपा के पास अपने 105 विधायक हैं। यानी सरकार बनाने के लिए उसे 40 अतिरिक्त विधायकों की जरूरत है। अगर वह कर्नाटक फार्मूला लागू करती है यानी ‘ऑपरेशन लोट्स’ चलाती है तो उसे 80 विधायकों के इस्तीफे कराने होंगे तभी वह अपने दम पर सरकार बना सकती है। ये दोनों काम मुश्किल हैं। न तो भाजपा को 40 विधायक मिलने जा रहे हैं और न 80 विधायकों का इस्तीफा होने वाला है। महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी की सरकार गिरने की एक ही स्थिति है और वह ये है कि शिव सेना वापस एनडीए में लौट आए या एनसीपी गठबंधन से अलग होकर भाजपा को समर्थन दे दे, जैसा कि उसने 2014 में दिया था। यानी महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार तभी बन सकती है जब कोई एक पार्टी पूरी की पूरी अलग हो और भाजपा को समर्थन दे।

अगर भाजपा ने इस्तीफे वाला रास्ता चुना तो दस-बीस विधायकों के इस्तीफे से बात नहीं बनेगी। भाजपा के नेता कह रहे हैं कि कांग्रेस के विधायक उनके संपर्क में हैं। पर उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि अगर भाजपा के पास 104 विधायक हैं तो शिव सेना और एनसीपी के पास 110 विधायक हैं। अगर कांग्रेस विधायकों का इस्तीफा होगा तो जितना फायदा भाजपा को होगा उससे ज्यादा शिव सेना और एनसीपी को होगा। सो, भाजपा को बिहार की तरह गठबंधन बदल कराना होगा। उसे किसी तरह का समझौता करके अपनी पुरानी सहयोगी शिव सेना को अपने साथ वापस लाना होगा।

पर यह भी संभव नहीं दिख रहा है क्योंकि सरकार बनाने और गिराने के खेल में दोनों पार्टियों के बीच झगड़ा इतना बढ़ गया है कि कम से कम अभी तुरंत तो समझौते की गुंजाइश नहीं है। डरा धमका कर गठबंधन तुड़वाने का रास्ता भाजपा ने खुद ही बंद कर दिया है। उसने सबसे बड़े घोटाले के आरोपी अजित पवार को साथ लेकर अपनी सरकार बनवाई थी। इसलिए अब उनके या एनसीपी के दूसरे नेताओं के खिलाफ कार्रवाई होती है तो लोगों में खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे वाला मैसेज जाएगा। सो, महाराष्ट्र में कर्नाटक जैसा खेल संभव नहीं है। हां, थोड़े समय के बाद बिहार जैसा खेल हो सकता है पर उसके लिए भाजपा को वैसे ही बहुत समझौता करना पड़ेगा, जैसा बिहार में करना पड़ा। आखिर बिहार में भाजपा छोटा भाई बनी तो समझौता हो गया। महाराष्ट्र में भी ऐसा करने को तैयार हो या बराबर बंटवारे के लिए तैयार हो तो संभव है कि शिव सेना से बात बन जाए।

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