मोदी के साथ मुख्यमंत्रियों का भी चेहरा

महाराष्ट्र और हरियाणा में 2014 का चुनाव नरेंद्र मोदी के चेहरे और अमित शाह के प्रबंधन पर लड़ा गया था। इस बार इन दोनों के अलावा दो मुख्यमंत्रियों के चेहरे भी हैं और उनके कामकाज का रिपोर्ट कार्ड भी है। यह एक बहुत बड़ा फर्क है, जो चुनाव पर सबसे ज्यादा असर डालेगा। ध्यान रहे 2014 के चुनाव में भाजपा इन दोनों राज्यों में एक क्लीन स्लेट की तरह चुनाव लड़ रही थी। उसने प्रदेश की राजनीति का कोई चेहरा आगे नहीं किया था। सभी समुदायों को भरोसा दिलाया था कि सरकार बनी तो उस समुदाय को कमान मिलेगी। पर चुनाव नतीजों के बाद भाजपा ने राजनीतिक लिहाज से बहुत बड़ा उलटफेर किया। दोनों राज्यो में सत्तारूढ़ जाति मानी जाने वाली जातियों को सत्ता से बाहर किया और नया समीकरण बनाया। इस बार के चुनाव में उस समीकरण की परीक्षा है।

ध्यान रहे महाराष्ट्र में हमेशा मराठा मुख्यमंत्री बनता था। मराठा समुदाय के लोग मानते थे कि किसी की सरकार बने सत्ता उनके हाथ में रहेगी। अगर मराठा नहीं होगा तो ओबीसी होगा या कांग्रेस ने एक बार दलित मुख्यमंत्री भी बनाया था। पर किसी ने ब्राह्मण मुख्यमंत्री के बारे में सोचा भी नहीं था और वह भी विदर्भ से। चुनाव के बाद भाजपा ने बड़ा तख्तपलट किया। उसने तमाम दावेदारों को छोड़ कर विदर्भ से आने वाले अपेक्षाकृत नए और युवा नेता देवेंद्र फड़नवीस को मुख्यमंत्री बनाया। संतुलन बनाने के लिए पार्टी राव साहेब दानवे पाटिल को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। इसी समीकरण के तहत चंद्रकांत पाटिल को अभी प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है।

पिछले चुनाव के प्रचार में नरेंद्र मोदी और अमित शाह, जहां भी गए वहां जिस समुदाय की प्रधानता थी उसे सत्ता का लॉलीपॉप दिखाया। पिछले चुनाव से ठीक पहले गुजरे ओबीसी नेता गोपीनाथ मुंडे की बेटी पंकजा मुंडे के प्रचार में गए तो अमित शाह ने लोगों का उत्साह देख कर कहा कि उन्हें समझ में आ रहा है कि लोग क्या चाह रहे हैं और लोग जो चाह रहे हैं वहीं किया जाएगा। यहीं बात बात मराठों, दलितों के असर वाले इलाकों में भी कही गई। पर अब ऐसी कोई बात नहीं है। अब देवेंद्र फड़नवीस का चेहरा है और पांच साल के उनके कामकाज की रिपोर्ट है। यह देखना दिलचस्प होगा कि अब दूसरी जातियां इस पर कैसे प्रतिक्रिया देती हैं।

क्योंकि उन्हें पता है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी उनके समुदाय को नहीं मिलनी है। यहीं स्थिति हरियाणा में भी है। 2014 के चुनाव से पहले हरियाणा में भी मुख्यमंत्री के कई दावेदार थे। पार्टी के जाट नेताओं में सबसे मुख्य चेहरा पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता कैप्टेन अभिमन्यु का था तो ब्राह्मण नेताओं में रामबिलास शर्मा सबसे बड़े दावेदार थे। पंजाबी नेताओं में भी अंबाला से लगातार जीत रहे अनिल विज दावेदार थे। पर चुनाव के बाद नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने पहली बार चुनाव जीते मनोहर लाल खट्टर को मुख्यमंत्री बनाया। उसके बाद पांच साल खट्टर के चेहरे पर भाजपा ने जाट बनाम गैर जाट का ध्रुवीकरण कराने का प्रयास किया है।

पंजाबी, वैश्य और ब्राह्मण का समीकरण मजबूत करने का काम किया है। इस समीकऱण की भी चुनाव में परीक्षा है। पिछली बार कांग्रेस और इनेलो को जाट चेहरे के मुकाबले भाजपा बिना चेहरे के थी, नरेंद्र मोदी के चेहरे पर लड़ रही थी। इसलिए हर जाति ने वोट दिया। इस बार कांग्रेस और इनेलो के जाट चेहरों के मुकाबले भाजपा का पंजाबी चेहरा है। यह बहुत बड़ा फर्क है। महाराष्ट्र की तरह हरियाणा में भी यह देखना दिलचस्प होगा कि दूसरी जातियों के लोग इस पर कैसे प्रतिक्रिया देते हैं।

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