कांग्रेस और विपक्ष किस मोड़ में?

पता नहीं! क्योंकि कांग्रेस में सोचने का मतलब सोनिया गांधी- अहमद पटेल और राहुल गांधी का सोचना है और इन तीनों के सोचने का भगवान मालिक है। तीनों अपने निजी एजेंडे, निजी आग्रह-पूर्वाग्रह में बंधे हुए है। सोनिया गांधी पहले दिन से मन ही मन राहुल गांधी को राजनैतिक विरासत सुपुर्द करने के विचार में बंधी है तो राहुल गांधी अपनी फितरत में अराजनीति का मिजाज लिए हुए हैं। उधर अहमद पटेल जैसे मनमोहनसिंह के वक्त चला उसकी आदत और मोदी-शाह से अपने को बचाए रखने की चिंता में बंधे हुए हंै। इसलिए ये तीन अपने को बदलेंगे नहीं और कांग्रेस चुनौती बनेगी नहीं। तभी यह मजाक ठीक है कि कांग्रेस की स्थिति अनारकली वाली हो गई है, अमित शाह उसे जीने नहीं देंगे तो जनता उसे मरने नहीं देगी और अनारकली खुद रोती रहेगी!

तभी कांग्रेस से ज्यादा दारोमदार कांग्रेस के भूपिंदरसिंह हुड्डा, अशोक गहलोत, दिग्विजयसिंह, अमरिंदरसिंह, भूपेश बघेल, हरीश रावत, वीरभद्र जैसे पुराने नेताओं पर है। इनसे तय होगा कि ये जनता की चाहना में कांग्रेस को खरा बनवाते है या नहीं?

दिक्कत यह है कि सोनिया-राहुल-अहमद पटेल जैसे है वैसे चलाएं रखेंगे तो कांग्रेस के प्रादेशिक नेता भी लाचार बने रहने है। तभी कांग्रेस के लिए शरद पवार जैसे विपक्षी नेताओं की संजीवनी का ज्यादा मतलब है। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के साथ कांग्रेस ने गुपचुप तालमेल बनाया और झारखंड में हेमंत सोरेन सहित पूरे विपक्ष (बाबूलाल मरांडी) का एलायंस बना तो भाजपा पर चैकमेट बन सकेगा। दिल्ली में आप व कांग्रेस आमने-सामने घमासान लड़े तो मोदी-शाह मौका नहीं चूकेंगे। ऐसे ही झारखंड में हेमंत सोरेन गलतफहमी में है कि वे कांग्रेस से एलायंस में अकेले बहुमत सीटे जीत जाएगें और बाबूलाल मारंडी या लालू यादव, लेफ्ट पार्टियों का मतलब नहीं है तो विपक्ष बुरी तरह पीटेगा। वहां बाबूलाल चुनाव बाद झारखंड में दुष्यंत चौटाला हो सकते है! हेमंत-मरांडी की आपसी लड़ाई में आदिवासी वोट बंटेगा और रघुवरदास की फिर खटके से शपथ!

तभी बुनियादी मसला विपक्ष में एक-दूसरे का साथ बना कर चुनाव लड़ने का है। शरद पवार ने जैसे महाराष्ट्र में समझदारी और मेहनत से चुनाव लड़ा वैसी ही एप्रोच हर प्रदेश के प्रमुख विपक्षी नेता ने अपनाई, तालमेल बनवाया तभी जनता में विकल्प का विश्वास बनेगा। तभी विपक्ष के स्थानिय मुद्दों पर संघर्ष और आंदोलन की रूपरेखा बन सकेगी। राज्यों में स्थानीय राजनीति, स्थानीय मुद्दों पर फोकस रखते हुए प्रादेशिक विरोधियों में जितनी एकता बनेगी उतना ही मुकाबला बनेगा! उस नाते आगे झारखंड और दिल्ली से अंदाज लगना है कि कांग्रेस और विपक्ष में ताजा अनुभव से समझदारी आई या नहीं?

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