याद करें कब था ऐसा वक्त?

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आप भी सोचें! आप जो देख-सुन व अनुभव याकि फील कर रहे हैं वैसा वक्त पहले कब था? हां, सोचें, क्या आपमें और आपके ईर्द-गिर्द बाजार में, धंधे, नौकरी, कंपीटिशन, यारी-दोस्ती में वह उमंग, वह जोश, वह उत्साह है जो पांच-दस साल पहले हुआ करता था? हां, जीवन हम सब जी रहे है, सवा सौ करोड़ लोग नित्यकर्म में बंधे हुए हैं बावजूद इसके सवा सौ करोड़ लोगों को यदि अलग-अलग समूह में बांट कर उनके अनुभव, उनकी फील को बूझें तो क्या तस्वीर उभरेगी? मिसाल के तौर पर बीस करोड़ मुसलमान को लें, उनका वक्त, जीवन क्या उमंग व उत्साह लिए हुए है? ये जीवन जीते हुए किस मनोदशा में होंगे? यहीं सवाल फिर दलितों के लिए हैं तो ब्राह्मण से बात करो या फारवर्ड और ओबीसी या व्यापारी वर्ग या छात्र-नौजवान वर्ग सभी ऐसे अजीब ठहराव, हताशा, बेचैनी में दिखेंगे, जिसमें रूटिन भले सहज है लेकिन घुटन और अनिश्चितता की गहराइयों के साथ।

क्या नहीं? आश्चर्य कि ऐसा तब है जब नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को वह छप्पर फाड़ जनादेश है, जिसके जोश में ही जनता को उछले हुए होना चाहिए था। लेकिन न केवल मोदी सरकार सहमी हुई है, बल्कि वोट देने वाले, कट्टर समर्थक भी सहमे हुए हैं। वे लोग तो वैसे ही बुझे और निराश हैं, जिन्हें आइडिया ऑफ मोदी पसंद नहीं है। हिसाब से प्रधानमंत्री मोदी, भाजपा और संघ परिवार को अपने आइडिया ऑफ इंडिया पर भरपूर झूमते हुए होना चाहिए। आखिर लगातार विजय ही विजय है। बावजूद गौर कीजिए कि विजयादशमी के दिन संघ प्रमुख मोहन भागवत का भाषण झूमो, नाचो, गाओ, जश्न मनाओ वाला नहीं था, बल्कि सफाई देने का था कि लिंचिंग से हमारा लेना-देना नहीं। मंदी पर सोचो मत सरकार पर भरोसा रखो आदि, आदि! मतलब यह भी कि समाजोत्थान, संस्कृतियोंत्थान का उद्घोष वाला संघ भी सरकार शरणम्!

क्यों? इसलिए कि सरकार और सरकार में भी दो अवतारों के अलावा सवा सौ करोड़ लोगों के पास है ही क्या? हां, सन् 2014 से 2019 की आने वाली दीपावली तक का हिंदू राष्ट्र दीये भले जलाता रहा हो और मोदी-शाह की रणनीति से आने वाले सालों में लगातार हिंदू दीये जलते रहें लेकिन राष्ट्र-राज्य बिना लक्ष्मीजी की चंचलता के है। जोखिम और जोश के बिना जुए के है। बिना शुद्ध मिठाई के है। बिना पटाखों के है और जो कुछ भी है वह सब आयातित, कामचलाऊ, दिखावे के चीनी सामानों से है! अयोध्या में योगी आदित्यनाथ कितना ही विशाल विजय दीपोत्सव मनवाएं मगर वह घर-घर के दीयों के साझे से नहीं मनेगा, बल्कि सरकारी बाबुओं के आयोजन से होगा।

बात सटीक बन रही है। हम सब दीपावली मनाने वाले हैं! हिंदू जन-जन दीपावली पर पूजा करेगा, जगमगाता त्योहार होगा लेकिन वह बस होने के लिए होगा। न तो हिंदू के घर में मनसा-वाचा-कर्मणा लक्ष्मीजी की वह चंचलता होगी जो पहले हुआ करती थी और न मन वह उमंग, उत्साह लिए हुए होगा कि चलो अगले साल के नए बहीखाते के लिए नए प्रोजेक्ट, नए संकल्प सोचें!

तभी भारत आज दुनिया का वह बिरला देश है, जिसमें जनादेश दो टूक है, बातें बड़ी हैं, ब्रांडिंग बड़ी है, हल्ला-शोर-प्रलाप नगाड़ों वाला है लेकिन लोग भावशून्य, जोशविहिन पुतले हैं। पुतलों का अनुभव हताशा, बेचैनी, अनिश्चितता और भाव शून्यता से भरा हुआ है। दिखता है कि न अमीर को फर्क पड़ रहा है और न गरीब को पड़ रहा है। सबने सब कुछ अपने को मोदीजी के भरोसे छोड़ दिया है। और मानने में हर्ज नहीं कि मोदीजी-शाहजी ने सारा बीड़ा उठाया हुआ है। ये सब करवा देंगे। चुन-चुन कर विदेशिय़ों को भारत से निकाल देंगे। पाकिस्तान को ठोक देंगे। आर्थिकी को पांच ट्रिलियन की बना देंगे। अय़ोध्या में मंदिर बन जाएगा। मुसलमान लाइन हाजिर रहेंगे। बावजूद इसके हर हिंदू मन ही मन लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा की पूजा करते हुए जान रहा है, समझ रहा है कि न धन की चंचलता है, न बुद्धि का विन्यास है और न भय से मुक्ति है। उलटे तीनों देवियों का पिछले छह सालों में ऐसा श्राप है, जिससे धन सूखा, बुद्धि सूखी और निडरता-साहस चौतरफा सूखा!

सोचें, ऐसा वक्त आजाद भारत के 72 साला इतिहास में पहले कब आया? मुझे सचमुच मौजूदा वक्त बहुत हैरान बना रहा है। सब कुछ वर्चुअल है हकीकत नहीं। सब कुछ होता लगता है और होता कुछ नहीं! चीन के राष्ट्रपति के साथ खूब फोटो शूट, कूटनीति है लेकिन वह फिर भी पाकिस्तान के साथ खड़ा है। विश्व कूटनीति में हर तरह की भागदौड़ है मगर कश्मीर के हालातों को ले कर अमेरिकी सांसदों से सुनना पड़ रहा है तो मानवाधिकार संस्थाओं से भी सुनना प़ड रहा है। कश्मीर घाटी में सब नियंत्रण में लगता है है लेकिन जीवन ठहरा हुआ है। पाकिस्तान को ठोक दिया है लेकिन उसके प्रधानमंत्री इमरान खान सरेआम भारत के खिलाफ जिहाद की घोषणा करने लगे हैं। आर्थिकी में सब ठीक बताया जा रहा है लेकिन अहसास सब गड़बड़ है। राजनीति में पताका नरेंद्र मोदी-अमित शाह-भाजपा की है लेकिन इस पताका में नीचे राजनीति बुझी हुई है, मुर्दा है। हिंदुओं का बोलबाला है लेकिन भय और आशंकाओं में हिंदू ही सर्वाधिक है! सतह पर सब ठीक है लेकिन नीचे फफोले पक रहे हैं। पोलापन पसर रहा है।

क्या नहीं? तभी सोचिए आजाद भारत के 72 साला इतिहास की अपनी स्मृतियों में आपको ऐसा वक्त, भारत राष्ट्र-राज्य का ऐसा मुकाम पहले कब अनुभव हुआ था?

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