ऐसा कब तक चलेगा?

क्या‍ यह सवाल आपके भी जहन में है? और है तो क्या खुद की परेशानी, अनिश्चितता से है या खबरों-सुर्खियों से देश की दशा-दिशा पर है? फिर आगे विचार करते हुए सोचें कि आपकी तरह दूसरे लोग, अगल-बगल के लोग भी क्या सवाल लिए हुए हैं कि- ऐसा कब तक चलेगा! जान लें मैंने मई 2019 के बाद इस तरह सोचना बंद किया हुआ है। अपने दिल दिमाग में वह लाइन उतरी हुई है कि दया करो उस देश पर जहां भेड़ें रहती हैं! जब कौम, धर्म, नस्ल, राष्ट्र-राज्य के मनोविज्ञान का सूत्र प्राप्त है तो क्यों सोचा जाए कि ऐसा कब तक? बात जब सनातनी है, आजाद भारत के पिछले 72 साल जब मूर्खताओं, अंधविश्वास, भक्ति में हंकते रहे हैं, सदियों-सहस्त्राब्दी जब गुलामी में, हाकिमगिरी में जीवन जीने का अपने पुरखों का इतिहास है तो ऐसा सोचना ही बेमानी है कि कब तक ऐसा चलेगा! इसका यह जवाब मानना भी व्यर्थ है कि जब तक नरेंद्र मोदी-अमित शाह रहेंगे तब तक ऐसा ही चलेगा! जब तक राहु-केतु की दशा है तब तक ऐसा ही चलेगा!

बावजूद इसके परिचितों का मुझसे सवाल करना जब है और सुर्खियों के शोर व दिल्ली में आवाजाही में दिक्कतों का सामना है तो मुझे भी आते-जाते ख्याल आता है कि ऐसा कब तक चलेगा? हाल में ठंड-स्मॉग के कारण मैं कई दिन राजस्थान में रहा। नए साल बाद दिल्ली लौटा और सेंट्रल दिल्ली जाना हुआ तो हैरान हुआ देख कर कि संसद भवन जाने के कृष्णा मेनन मार्ग को अमित शाह के घर की सुरक्षा में बंद कर दिया गया है और पहले सप्ताह से ही 26 जनवरी के चलते पूरा राजपथ बंद है। जेएनयू की तरफ से जाओ-आओ तो दिक्कत व आए दिन जाम! हां, 26 जनवरी के लिए जनवरी के पहले सप्ताह से ही राजपथ इलाके का छावनी बनना खालिस्तानी आंदोलन के वक्त भी नहीं हुआ था। भला यह क्या? पहले से ही सुरक्षा चाक चौबंद में घिरी लुटियन दिल्ली में गृह मंत्री के घर की मुख्य सड़क भी यदि क्लोज हो जाए और भारत का प्रधानमंत्री अपनी ही पार्टी की सरकार के असम में आंदोलन-सुरक्षा की चिंता में दौरा रद्द करे तो दिल-दिमाग में ख्याल आना स्वाभाविक है कि ऐसा कब तक चलेगा!

सो, जो है और जो हुआ है वह मेरी याददाश्त में अनोखी स्थिति है। आजाद भारत के 72 साल में ऐसा कभी नहीं हुआ जो हर कोई यह बैचेनी बताते हुए मिल रहा है कि ऐसा कब तक चलेगा? अपना मानना है खुद नरेंद्र मोदी और अमित शाह भी मन ही मन सोचते होंगे कि ऐसा कब तक चलेगा? अमित शाह जब तड़ी पार के दिनों में कृष्णा मेनन मार्ग के बगल के गुजरात भवन में अकेले दिल्ली में बिना सुरक्षा कार से आया-जाया करते थे और आज उन्हीं को घर की किलेबंदी के साथ अगल-बगल की सड़कों की भी किलेबंदी चाहिए तो उनमें भी ख्याल बनता तो होगा कि ऐसा कब तक? कब सामान्य दिन लौटेंगे? यहीं विचार नरेंद्र मोदी को भी तब आता होगा जब 26 जनवरी के सुरक्षा बंदोबस्तों पर विचार होता होगा या असम जाने या न जाने का सवाल आया होगा। और नोट रखें, अपना मानना है कि आने वाली 26 जनवरी को राजपथ की परेड आजाद भारत के इतिहास में सर्वाधिक सख्त सुरक्षा बंदोबस्त लिए हुए होंगे!

सुरक्षा भारत-पाक सीमा पर सख्त तो जम्मू-कश्मीर घाटी, पूर्वोत्तर भारत में भी सख्त तो उत्तर प्रदेश, जेएनयू, जामिया मिलिया में भी सख्त! मोदी-शाह हों या योगी या सोनोवाल या मुर्मू सबको दिन-रात सुरक्षा बंदोबस्तों की चिंता में रहना होता है। किसके चलते? छात्रों के, मुसलमानों के, विरोधी पार्टियों के, आंदोलनकारी मजदूरों की चिंता में रहना होता है! सोचें, भारत का सेनापति खुलेआम विरोधी नेताओं को लोगों को गुमराह करने वाला बता रहा है तो समझ सकते हैं कि अंदरूनी हालात में कैसी क्या चिंता है! भारत का मीडिया जैसा नैरेटिव बनाए हुए है और इस सप्ताह देश के हालातों पर जनाब चीफ जस्टिस ने जैसे चिंता जाहिर की उससे भी पता पड़ता है कि देश दशा किस दशा में है तो आम नागरिक, आम कारोबारी भला क्यों न सोचे, पूछे कि ऐसा कब तक चलेगा?

जवाब में यह बुनियादी सत्व-तत्व की बात नोट रखें कि जब तक नरेंद्र मोदी और अमित शाह की सत्ता है तब तक ऐसा ही चलेगा! यहीं मोदी-शाह राज की प्रकृति है, प्रवृत्ति है और नियति है! ऐसा ही चलेगा। चिंता, खौफ, असुरक्षा, अनिश्चिता, बरबादी ही नियति है। मोदी-शाह भी खौफ-असुरक्षा में सत्ता भोगते रहेंगे तो भारत का औसत नागरिक भी इन्हीं भावों में डूबेगा, तैरेगा। पर मोदी-शाह सुरक्षा के बाड़े में अपने को और देश को जितना अधिक पाएंगे, जितनी अशांति, आंदोलन, तू तू, मैं-मैं, राजनीतिक टकराव, पुलिस-आंदोलनकारी मुठभेड़ की सुर्खियां देखेंगे उतने ही आनंदित होते जाएंगें। इसलिए कि इनके लिए यह सब उस रणनीति की सफलता का पर्याय है, जिससे सत्ता और सत्ता का हिंदू राष्ट्रीयकरण सौ टका संभव है।

मैं बहुत बड़ी थीसिस पर पहुंच गया हूं। इसकी पुष्टि इस हकीकत से भी बूझ सकते हैं कि क्या मोदी-शाह के चेहरे पर रत्ती भर परेशानी कभी कोई झलकी? क्या प्रधानमंत्री ने, उनके दफ्तर ने, गृह मंत्री ने आंदोलनकारियों, विरोधियों से इंच भर भी सुलह-समझाने की कोशिश की। बात नहीं, संवाद नहीं, सर्वानुमति नहीं, समझाने-बुझाने, तर्क-दलील-बुद्धि का सत्य नहीं, बल्कि कथित लौह नेतृत्व में लाठी के शंतरज में चौबीसों घंटे रमे हुए होना। इसलिए क्योंकि मकसद हिंदू बनाम मुस्लिम से, पृथ्वीराज बनाम जयचंद से, देशभक्त बनाम देशद्रोह के ग्रैंड विजन में 2024 और 2029 में वोट पकवाने वाली लकड़ियों को इकठ्ठा करना है!

इसलिए ऐसा ही चलता रहेगा! यहीं 21वीं सदी के तीसरे दशक की भारत राष्ट्र-राज्य की नियति है! सो, जब ऐसा है तो छोड़ो हताशा, बैचेनी और गाओ प्रभुजी (मोदी-शाह) के भजन। बनाओ मंदिर और पाओ सांसारिक चिंताओं से मुक्ति!

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