भारत दशा बताते विधानसभा चुनाव!

यों उम्मीदवार और खास कर राष्ट्रीय दर्जे की पार्टी के उम्मीदवार जी जान से चुनाव लड़ रहे होंगे। जिसे टिकट मिलता है वह पूरा दम लगाए हुए होता है। उम्मीदवारों की मेहनत, दमखम और मुकाबले में कोई कमी नहीं होती। उस नाते राष्ट्रीय स्तर पर भले लगे कि महाराष्ट्र व हरियाणा में भाजपा के आगे मुकाबला क्या है या भाजपा की एकतरफा जीत है तो ऐसा सोचना ठीक नहीं होगा। बावजूद इसके अपनी जगह तथ्य है कि महाराष्ट्र व हरियाणा के चुनावों पर राष्ट्रीय कौतुक, दिलचस्पी नहीं है। मनोभाव है कि भाजपा जीती हुई है और भाजपा जीत भी जाए तो क्या होना है! मनोहर लाल खट्टर व देवेंद्र फडनवीस वापिस मुख्यमंत्री बनंे तब भी कोई अर्थ नहीं है।

जाहिर है विधानसभा चुनाव नरेंद्र मोदी और अमित शाह के उन चेहरों पर लड़े जा रहे हंै, जिसके आगे प्रदेश चेहरे और राजनीति असप्रासंगिक है। ये चुनाव उन राष्ट्रीय मुद्दों याकि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 हटाने, एनआरसी, हिंदू बनाम मुस्लिम के उस हल्ले और नैरेटिव पर है जिसके आगे न विपक्ष का मतलब है और न प्रदेश के मुद्दों, जातिय समीकरणों या खुशहाली- बदहाली, मंदी आदि का कोई मतलब है। कई जानकार चुनावों पर चर्चा करते हुए कांग्रेस के मरे होने, विपक्ष के लुटे-पीटे होने की बाते करते हुए राहुल गांधी या सोनिया गांधी या शरद पवार-अजित पवार आदि के बेअसर होने की बात करते है लेकिन हकीकत में भारत के मौजूदा वक्त में ऐसा कुछ है ही नहीं जिससे ग्रह-नक्षत्रों की, चेहरों की, मुद्दों की कोई चाल बने।

सचमुच भारत, भारत की राजनीति, भारत के चुनाव और भारत की आर्थिकी सबमें एक ऐसा ठहराव है जिसमें सुर्खियों की हलचल के अलावा कुछ नहीं है। ये सुर्खियां क्योंकि प्रायोजित है इसलिए न लोगों का मूड और मुद्दे मुखर है और न जमीनी असलियत पर लोगों की नजरे हंै। हिसाब से महाराष्ट्र, हरियाणा के विधानसभा चुनाव और पूरे देश में कोई 51 उपचुनावों को लेकर दस तरह का संस्पेंस, कौतुक और अर्थ निकले हुए होने चाहिए लेकिन जो चुनाव लड़ रहे हंै उनका जरूर समय खंप रहा है बाकि किसी की कोई दिलचस्पी नहीं है। क्या यह मूड पूरे देश की राजनीति का प्रतीक नहीं है?

बावजूद इसके यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह सबकुछ एकतरफा होते हुए भी 2014 के महाराष्ट्र, हरियाणा चुनाव के मुकाबले में आज अधिक सर्तक और सावधान हंै। तब महाराष्ट्र में भाजपा ने अपने अंहकार में अकेले चुनाव लड़ा था लेकिन इस बार जैसे भी हो शिवसेना को साथ में लिया हुआ है। इन्होने दोनों राज्यों में जातिगत समीकरणों पर, दमदार उम्मीदवार खड़े करने पर ज्यादा फोकस बनाया हुआ है। कुछ भी हो आज ज्यादा हिंदू-मुस्लिम और राष्ट्रीय मुद्दों पर फोकस बनवा रखा है। ठीक विपरीत कांग्रेस, एनसीपी, सोनिया गांधी-राहुल गांधी- शरद पवार आदि यह मान कर चुनाव लड़ रहे हंै कि वक्त सही नहीं है तो बस कहने को चुनाव लड़ना है। कांग्रेस ये चुनाव पूरी तरह लावारिस दशा में लड़ रही है। दरअसल विपक्ष खत्म नहीं है पर लावारिस है।

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