आर्थिक हालात कब तक ऐसे?

आठ नवंबर 2016 को नोटबंदी करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के लोगों से कहा था कि वे उनको 50 दिन दें और इन 50 दिनों में सारी चीजें ठीक हो जाएंगी। उन्होंने 50 दिन बाद चीजें ठीक नहीं हुई तो चौराहे पर फांसी पर लटकने या जिंदा जला देने वाली जो बातें कहीं थीं। वो तो खैर जुमला थीं, लेकिन काला धन खत्म हो जाने, भ्रष्टाचार रूक जाने, कैशलेस व्यवस्था बन जाने की बातें तो जुमला नहीं थीं या कम से कम लोगों ने इन्हें जुमले की तरह नहीं लिया था। पर उस घोषणा के 1157 दिन हो गए हैं और अभी तक लोग और देश की अर्थव्यवस्था भी उस सदमे से नहीं उबर पाई है। उस समय पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सकल घरेलू उत्पाद, जीडीपी के दो फीसदी तक गिरने का अंदेशा जताया था पर इस साल तो विकास दर तीन फीसदी तक कम होती दिख रही है। ध्यान रहे भारत की अर्थव्यवस्था करीब डेढ़ सौ लाख करोड़ रुपए की है। इसमें तीन फीसदी का मतलब एक साल में साढ़े चार लाख करोड़ रुपए की आर्थिक गतिविधियों में कमी आना है।

सोचें, इसका असर कितना बड़ा होगा। आर्थिक गतिविधियों में साढ़े चार लाख करोड़ रुपए की कमी आने से कितने लाख लोगों की नौकरियां जाएंगी, कितने कारोबार बंद होंगे और कैसा संकट खड़ा होगा! पर यह संकट देश का नया न्यू नॉर्मल लग रहा है। ऐसा लग रहा है कि कहीं कुछ भी नहीं हुआ है। महीना दर महीने सरकार का कर राजस्व कम हुआ है पर ऐसा लग रहा है कि सब कुछ ठीक है। तभी गुरुवार को आर्थिकी पर विचार के लिए हुई नीति आयोग की बैठक में प्रधानमंत्री ने कहा कि देश की अर्थव्यवस्था के फंडामेंटल्स ठीक हैं।

प्रधानमंत्री ने डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा देने और देश को कैशलेस अर्थव्यवस्था की ओर ले जाने का संकल्प जताया था। आज उस संकल्प की आम आदमी पर ऐसी मार पड़ी है, जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। बिना तैयारी की डिजिटल लेन देन को बढ़ावा देने का नतीजा यह हुआ है कि साल दर साल बैंकिंग फ्रॉड में कई गुना बढ़ोतरी होती गई है। बैंकों से लेकर आम आदमी तक के खाते में सेंध लग रही है और हजारों करोड़ों रुपए की लूट हो रही है। रिजर्व बैंक ने बताया है कि पिछले वित्त वर्ष यानी 2018-19 में 71 हजार करोड़ रुपए का बैंकिंग फ्रॉड हुआ है। चालू वित्त वर्ष के पहले छह महीने में यानी एक अप्रैल से 30 सितंबर के बीच 95 हजार करोड़ रुपए का बैंकिंग फ्रॉड हुआ है। यह बात खुद केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय ने संसद में बताई है। 2014-15 के वित्त वर्ष में कुल बैंकिंग फ्रॉड दस हजार करोड़ रुपए का था, जो अब प्रति महीने 15 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा हो गया। बैंकों और आम आदमी की यह लूट भी न्यू नॉर्मल है।

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