सब ठीक का ‘न्यू नार्मल’

ऐसा नहीं है कि यह हालात एक महीने पहले नागरिकता कानून पास होने के बाद बने हैं। पिछले तीन महीने से यह राष्ट्रीय राजधानी का न्यू नार्मल (सब कुछ सामान्य का नया अर्थ) है। सड़कों का बंद होना, ट्रैफिक डायवर्ट होना, इंटरनेट का बंद होना, मेट्रो स्टेशन का बंद होना अब भारत की राजधानी का न्यू नार्मल है। जेएनयू के छात्र फीस बढ़ोतरी के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं तो सब बंद कर दो। दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र तदर्थ शिक्षकों के अधिकार के लिए आंदोलन कर रहे हैं तो सब बंद कर दो। जामिया के छात्र नागरिकता कानून के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं तो सब कुछ बंद कर दो। हां, मजदूर संगठन आर्थिक नीतियों के विरोध में आंदोलन का ऐलान करते हैं तो पुलिस और प्रशासन की भरपूर कोशिश होती है कि कहीं भी बंद का असर न दिखे, कोई सड़क बंद न हो और कहीं जाम न लगे, चाहे इसके लिए लाठी ही क्यों चलानी पड़े।

ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ राष्ट्रीय राजधानी की स्थिति है। देश के हर हिस्से में आंदोलन, प्रदर्शन चल रहे हैं, जुलूस और रैलियां निकल रही हैं। मुंबई में फिल्मी बिरादरी के लोग गेटवे ऑफ इंडिया, कार्टर रोड, आजाद मैदान, अगस्त क्रांति मैदान में रैलियां, प्रदर्शन कर रहे हैं। ममता बनर्जी कोलकाता में सात दिन तक लगातार रैली करने के बाद अब राज्य के दूसरे जिलों में जाकर प्रदर्शन और रैलियां कर रही हैं। बिहार के गया जिले में पिछले एक महीने से हजारों लोग धरने पर बैठे हैं। कोच्चि, हैदराबाद, चेन्नई जैसे शहरों में, जहां नागरिकता कानून का रत्ती भर भी असर नहीं होना है वहां भी लगभग रोज आंदोलन हो रहे हैं।

ऐसा भी नहीं है कि नागरिकता कानून की वजह से देश मुश्किल हालात में पहुंचा है। पिछले पांच साल में किसी न किसी वजह से मुश्किल हालात बने रहे हैं। कभी रोहित वेमुला की आत्महत्या के बहाने छात्र आंदोलित हुए तो कभी दिल्ली के जेएनयू में, उत्तराखंड के आयुर्वेद विश्वविद्यालय, आईआईटी में मास्टर कोर्स की फीस या दूसरी जगहों पर फीस बढ़ोतरी को लेकर आंदोलन हुए। कभी कश्मीर को लेकर नारेबाजी या कश्मीर समर्थक पोस्टर की वजह से विवाद हुआ। कभी गौमांस रखने के आरोप में या गोरक्षा के नाम पर अखलाक मारा गया या पहलू खान मारा गया, अवार्ड वापसी हुई, मॉब लिंचिंग हुई और फिर यह सब कुछ इतना बढ़ गया कि भीड़ की हिंसा देश में न्यू नॉर्मल हो गई। बच्चा चोरी के शक में तो मवेशी चोरी के शक में तो छेड़छाड़ के आरोप में भीड़ द्वारा लोग मारे जाने लगे। इन बरसों में देशद्रोह का आरोप भी देश का न्यू नॉर्मल हो गया। अकेले झारखंड के धनबाद में एक पुलिस अधिकारी ने तीन हजार लोगों पर देशद्रोह का मुकदमा कर दिया, जिसे नई सरकार ने वापस लेने का ऐलान किया है। जम्मू कश्मीर के हालात का क्या कहना। वहां पिछले एक साल से ज्यादा समय से विधानसभा भंग है और अगस्त में राज्य का विशेष दर्जा खत्म करने के बाद से कई किस्म की पाबंदियां लगी हैं और नेता नजरबंद हैं। वह भी कश्मीर का न्यू नॉर्मल है। यह सब कब तक चलता रहेगा, इसका किसी को अंदाजा नहीं है। हालांकि दिल्ली के लिए तो लोग कह रहे हैं कि आठ फरवरी को वोटिंग के बाद सब सामान्य हो जाएगा।

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