भक्त मानें या पुतला या पागल?

कैसे हैं हम सवा सौ करोड़ लोग? जवाब में एक तर्क होगा कि अब हम बदल गए हैं! हम वैसे नहीं रहे जैसे प्रधानमंत्री मोदी के सत्ता में आने से पहले थे। कह सकते हैं कि भारत के लोग, खास कर हिंदू समझदार हो गए हैं। हम समझदारों ने मोदी-शाह का सत्ता अभिषेक कर, सत्ता का हंटर उनके हाथों में दे कर 2014 से पहले चले आ रहे सर्कस को व्यवस्थित बनवा दिया है। भारत में वह ताकत आ गई है, जिसमें लक्ष्मी, बुद्धि और शक्ति भले ठिठकी हुई हो, लक्ष्मी-सरस्वती-दुर्गा की कृपा भले कम हो लेकिन हिंदुओं की भक्ति बढ़ी हुई है। सत्ता के हंटर के भय की प्रीत से हम सुरक्षा पाते हैं तो हार्ड वर्क से सोने की चिड़िया की चहचहाट सुन रहे हैं।

पहेली है कि जैसी प्रजा बनी है क्या वैसा वक्त नहीं है? प्रजा भक्त है तभी तो ये जुमले हिट हैं कि जो 70 साल में कभी नहीं हुआ वह पांच साल में हो गया है या ‘देश बिकने नहीं दूंगा’ या चुन चुन कर घुसपैठियों को निकालेंगे या पांच ट्रिलियन की इकॉनोमी बना देंगे। इन बातों को यदि नागरिकों ने सिर आंखों पर लिया हुआ है तो जाहिर है कि नागरिकों की दशा भी आज उस अवस्था में है जो 2014 से पहले कभी नहीं थी। इसे इस तरह समझा जाए कि मीडिया पहले जैसा था आज नहीं है। सुप्रीम कोर्ट और अदालतें जैसी पहले थीं वैसी आज नहीं है। सिविल सोसायटी, एनजीओ जैसे पहले थे वैसे अब नहीं हैं। राजनीति जैसी पहले थी (भाजपा जैसे पहली थी, विपक्ष पहले जैसा था या कांग्रेस जैसे पहले थी आदि) अब नहीं है। समाज जैसा था वैसा अब नहीं है। आर्थिकी जैसे पहले थी वैसी अब नहीं है। प्रधानमंत्री जैसे पहले थे वैसे अब नहीं है। केंद्र सरकार और उसकी मशीनरी जैसे पहले थी वैसी अब नहीं है।

यह सब स्थितियों में गुणात्मक परिवर्तन है तो सवा सौ करोड़ लोगों के देखने का, व्यवहार का, सोचने के तरीके में आए परिवर्तन का भी परिणाम है। मामला कुछ पेचीदा होता जा रहा है। सो, नोट करने वाली बात है कि लोगों का व्यवहार बदला है। लोगों की प्रकृति में या भक्ति है या उदासीनता और पुतलापन है या पागलपन है। वह जिंदादिली, वह बेखौफी, वह बुद्धिमत्ता, वह विचारमना व्यवहार नहीं है जो 2014 से पहले लोगों के नजरिए का थिरकाया करता था, आंदोलित करता था या सवाल और जवाबदेही बनवाया करता था।

उस नाते 2014 से पहले का आजाद भारत आकाश पर पत्थर उछालने, अधिकारों की जिद्द लिए लोगों का उपक्रम था जबकि अब भक्ति का समर्पण लिए हुए है। तब लोकतंत्र एक्टिविस्टों, सक्रिय नागरिकों का उपक्रम था अब वह पुतलों का अनुभव है। तब दिमाग, विचार और विचारधाराओं का बौद्धिक विमर्श, नैरेटिव था अब पागलों का पागल नैरेटिव है।

सोचें, तब और अब के फर्क पर? कौम, नागरिकों और भारत राष्ट्र-राज्य के अनुभव और उसकी मनसा, वाचा, कर्मणा प्रवृतियों पर! सोचें 2014 से पहले भारत की राजनीति में, आर्थिकी में, समाज में कैसी सरगर्मी थी, कैसी छटपटाहट थी, कैसे लोग थे, कैसा व्यवहार था और अब क्या है? तभी लाख टके का सवाल है कि हम भला हैं क्या? आज का वक्त हमें अपना आईना क्या दिखला रहा है?

वाह क्या बात निकली! कभी गहराई से इस आईने पर और सोचना पड़ेगा।

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