हेमंत निभाएंगे पवार वाला रोल!

इस बार विधानसभा चुनाव में महाराष्ट्र में जो भूमिका शरद पवार ने निभाई वह भूमिका झारखंड में हेमंत सोरेन को निभानी है। पवार जैसे क्षत्रप के साथ हेमंत सोरेन की तुलना अतिरंजना लग सकती है पर राज्यों की राजनीति में इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि क्षत्रप का राष्ट्रीय कद कितना बड़ा है। दुष्यंत चौटाला की पार्टी महज 11 महीने की है और इससे पहले अब तक वे सिर्फ एक बार सांसद रहे हैं और पिछला चुनाव हार भी गए थे। इसके बावजूद उन्होंने भाजपा और कांग्रेस दोनों के पसीने छुड़ा दिए।

तभी यह मानने में हिचक नहीं है कि पवार ने महाराष्ट्र में जो किया वह हेमंत सोरेन झारखंड में कर सकते हैं पर उसकी शर्त है कि वे पवार की तरह काम करें। एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने सबसे पहले क्या किया? उन्होंने कांग्रेस की ताकत और उसकी जरूरत को समझा। जिस समय देश भर यूपीए की पार्टियां कांग्रेस को खत्म हुआ मान रही थीं और ऐसा लग रहा था कि अब कांग्रेस बिल्कुल अप्रासंगिक हो गई है और राहुल गांधी किसी काम के लायक नहीं हैं तब भी पवार ने कांग्रेस से बात की। उन्होंने पहले राहुल से और फिर सोनिया गांधी से सीधी बात करके तालमेल तय कराया।

यहां तक कि कांग्रेस की ताकत घटने और लोकसभा चुनाव में उसके सिर्फ एक सीट पर सिमट जाने के बावजूद पवार ने कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में ज्यादा सीटें दीं। ध्यान रहे लोकसभा चुनाव में कांग्रेस एक और एनसीपी चार सीट पर जीती थी। फिर भी विधानसभा में कांग्रेस डेढ़ सौ सीटों पर लडी। पवार ने यह जिद नहीं पकड़ी कि अब कांग्रेस राज्य में खत्म हो गई है तो एनसीपी ज्यादा सीटों पर लड़ेगी। इतना ही नहीं उन्होंने भाजपा के सहयोगी रहे राजू शेट्टी को भी तालमेल के लिए तैयार किया। उनके स्वाभिमानी पक्ष के लिए सीटें छोड़ीं। गठबंधन बनाने के बाद उन्होंने भाजपा और शिव सेना के खिलाफ आक्रामक प्रचार शुरू किया। उनकी पार्टी के लगभग सारे दिग्गज नेता भाजपा और शिव सेना ने तोड़ लिए। इसके बावजूद पवार ने अपने और अपने मतदाताओं के ऊपर भरोसा किया और नतीजा सबके सामने है।

अब इसकी तुलना झारखंड और हेमंत सोरेन से करें। भाजपा हेमंत की पार्टी भी तोड़ रही है। इसी हफ्ते झारखंड मुक्ति मोर्चे के तीन विधायक भाजपा में शामिल हुए हैं। पिछले महीने जेएमएम के एक पूर्व उम्मीदवार को भाजपा ने अपनी पार्टी में शामिल कराया। कहा जा रहा है कि और भी जेएमएम नेताओं पर भाजपा की नजर है। यानी भाजपा झारखंड में हेमंत सोरेन के साथ वहीं कर रही है, जो उसने महाराष्ट्र में शरद पवार के साथ किया। इसलिए हेमंत को भी वहीं करना चाहिए, जो पवार ने किया। जिस तरह पवार को यकीन था कि मराठा वोट उनका साथ देगा वैसे ही हेमंत को यकीन होना चाहिए कि आदिवासी उनका साथ देंगे। आखिर आदिवासियों की नाराजगी छत्तीसगढ़ के चुनाव में दिखी है। उन्होंने भाजपा का सफाया किया। अगर हेमंत को यकीन हो तो वे एक मजबूत गठबंधन बना कर भाजपा क चुनौती दे सकते हैं।

पिछला लोकसभा चुनाव जेएमएम, कांग्रेस, जेवीएम और राजद ने मिल कर लड़ा था। कहा जा सकता है कि यह प्रयोग बहुत सफल नहीं हुआ। यह गठबंधन सिर्फ दो ही सीटें जीत पाया। पर यहीं कहानी महाराष्ट्र में भी हुई थी। कांग्रेस और एनसीपी का गठंबधन लोकसभा में 48 में से महज पांच सीट जीत पाया था। पर विधानसभा चुनाव में आंकड़ा एक सौ तक पहुंच गया। यह भी ध्यान रखना होगा कि जेएमएम-कांग्रेस का गठबंधन भले दो ही सीट जीता पर कम से कम तीन सीटों पर हार का अंतर बहुत मामूली था। अगर गठबंधन में टिकट सही बंटे होते और राजद ने जिद करके अपने हिस्से के अलावा एक दूसरी सीट पर उम्मीदवार नहीं उतारा होता तो हो सकता है कि तस्वीर कुछ और होती।

बहरहाल, कांग्रेस ने आदिवासी नेता को अध्यक्ष बनाया है। जेवीएम के नेता बाबूलाल मरांडी आदिवासियों के बड़े नेता हैं और राज्य के पहले मुख्यमंत्री हैं। शिबू सोरेन खुद राज्य के आदिवासियों के सबसे बड़े नेता हैं। अगर ये तीनों पार्टियां तालमेल करती हैं तो राज्य के चुनाव में मुकाबला एकतरफा नहीं रह जाएगा। महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव ने प्रमाणित किया है कि विधानसभा में लोग बिल्कुल उसी तरह मतदान नहीं करते हैं, जैसे लोकसभा में करते हैं। लोकसभा के मुकाबले विधानसभा में हरियाणा में भाजपा का वोट 23 फीसदी कम हो गया। यह कहानी झारखंड में भी दोहराई जा सकती है। जिन लोगों ने मोदी को फिर से प्रधानमंत्री बनाने के लिए वोट दिया, जरूरी नहीं है कि वे सारे लोग रघुवर दास को फिर से मुख्यमंत्री बनाने के लिए भी वोट करें। मोदी के मुकाबले विपक्ष के पास प्रधानमंत्री का दूसरा दावेदार नहीं था पर भाजपा के मुख्यमंत्री के मुकाबले विपक्ष के पास कई बड़े और अच्छे चेहरे हैं।

इन सबको एक साथ लाने की जिम्मेदारी हेमंत सोरेन की है। उन्हें शऱद पवार की तरह पहल करनी होगी औऱ अपने छोटे छोटे हितों को छोड़ते हुए गठबंधन करना चाहिए। कांग्रेस, जेएमएम और जेवीएम तीनों के साथ भाजपा वहीं बरताव कर रही है, जो महाराष्ट्र में कांग्रेस और एनसीपी के साथ किया। इसलिए अगर हेमंत पहल करते हैं तो बाकी पार्टियों को उनके साथ जुड़ने में दिक्कत नहीं होगी। यह भी ध्यान रखना होगा महाराष्ट्र में विपक्ष ने मुख्यमंत्री का कोई चेहरा प्रोजेक्ट नहीं किया था। सो, हेमंत सोरेन को भी यह जिद छोड़नी चाहिए कि विपक्ष उनका चेहरा प्रोजेक्ट करके लड़े। नेताओं के बीच आपसी सहमति बन जाए तो उसे ऐलान करने की जरूरत नहीं होती है।

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