2014 बनाम 2019 का फर्क!

एक बार फिर लोकसभा चुनाव के बाद वाले पहले विधानसभा चुनाव का समय है। 2014 के मई में नरेंद्र मोदी की कमान में भाजपा ने चुनाव जीता था और केंद्र में उसकी सरकार बनी थी। उसके तुरंत बाद अमित शाह को राजनाथ सिंह की जगह राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया। तब मोदी-शाह की जोड़ी ने पहला चुनाव महाराष्ट्र और हरियाणा में लड़ाया था। दोनों जगह इससे पहले कभी भी भाजपा का मुख्यमंत्री नहीं रहा था। हरियाणा में भाजपा हाशिए की पार्टी थी तो महाराष्ट्र में भी चौथे नंबर की पार्टी थी। कांग्रेस, एनसीपी और शिव सेना के बाद उसका नंबर आता था। इस लिहाज से दोनों राज्यों में भाजपा का बहुत कुछ दांव पर नहीं लगा था। दांव पर कांग्रेस की सरकार थी। ठीक विपरीत इस बार कांग्रेस विपक्ष में रह कर चुनाव लड़ रही है। पुरानी हकीकत है कि भाजपा को अपनी राज्य सरकारें बचाने में हर जगह मुश्किल आती है। भाजपा शासित जिन राज्यों में चुनाव हुए हैं वहा विपक्ष का प्रदर्शन अच्छा रहा है।
सो, इस बार इन दोनों राज्यो में भाजपा की सरकार दांव पर लगी है और नरेंद्र मोदी व अमित शाह की साख भी दांव पर लगी है। पिछली बार भाजपा को सत्ता मिली थी और इस बार उसे सत्ता बचानी है। 2014 में दोनों राज्यों में कांग्रेस की सरकार थी। महाराष्ट्र में 15 साल से और हरियाणा में दस साल से कांग्रेस का मुख्यमंत्री था। केंद्र में भी कांग्रेस की दस साल पुरानी सरकार के हटे चार ही महीने हुए थे। यानी इन दोनों राज्यों में दोहरी एंटी इन्कंबैंसी थी। दोनों जगह क्षेत्रीय पार्टियां थीं पर सीधी लड़ाई कांग्रेस से थी, जिसे लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 44 सीटों पर ला दिया था। इसलिए राज्यों में भी कांग्रेस को हराना बहुत आसान साबित हुआ।
हालांकि इसके बावजूद दोनों राज्यों में लोकसभा के मुकाबले भाजपा के वोट में दस फीसदी तक की कमी आई। तमाम लहर होने के बावजूद हरियाणा में भाजपा 46 सीट जीत पाई। 90 सदस्यों के सदन में 46 का आंकड़ा साधारण बहुमत का आंकड़ा होता है। एक बड़ा फर्क यह है कि 2014 में भाजपा ने महाराष्ट्र में बड़ा जोखिम लिया था। उसने दो दशक से ज्यादा पुराना शिव सेना के साथ अपना गठबंधन तोड़ दिया था। लोकसभा चुनाव के नतीजों से उत्साहित भाजपा ने शिव सेना को छोड़ कर चुनाव लड़ा और पहली बार उसके विधायकों की संख्या तीन अंकों में पहुंची। भाजपा ने अकेले 122 सीटें जीतीं और उसने दिखा दिया कि वह शिव सेना के बगैर भी चुनाव जीत सकती है। उसने चुनाव के बाद एनसीपी के समर्थन से सरकार बनाई और बाद में झक्ख मार कर शिव सेना को उसके साथ आना पडा।
पिछले चुनाव से एक फर्क यह भी है कि पिछली बार कांग्रेस और एनसीपी भी अलग-अलग लड़े थे। इस बार दोनों साथ मिल गए हैं और भाजपा की भी एक पुरानी सहयोगी, किसानों की पार्टी स्वाभिमानी पक्ष को अपने गठबंधन में शामिल किया है। तभी मजबूरी में भाजपा और शिव सेना को भी साथ लड़ना पड़ रहा है। दोनों पार्टियों में सीटों की संख्या को लेकर खूब खींचतान हुई फिर भी दोनों को साथ लड़ना पड़ रहा है। इससे भी जाहिर हो रहा है कि पांच साल सरकार चलाने के बाद भाजपा इतने आत्मविश्वास में नहीं है कि पिछली बार की तरह अकेले चुनाव लड़ जाए। कांग्रेस और एनसीपी के साथ आने से भाजपा व शिव सेना का यह आत्मविश्वास हिला है। भाजपा और शिव सेना साथ आ गए हैं इसके बावजूद दोनों में अंदरखाने चुनाव बाद की रणनीति को लेकर रस्साकशी चल रही है। चुनाव के बाद सीटों की संख्या के लिहाज से बहुत बड़ी उलटफेर हो सकती है।
हरियाणा में एक फर्क यह है कि इस बार मुकाबला भाजपा बनाम कांग्रेस का हो गया है। पिछली बार मजबूत क्षेत्रीय पार्टी के तौर पर इंडियन नेशनल लोकदल की भी मौजूदगी थी। पर इस बार पार्टी टूटी हुई है। इनेलो के दो हिस्से हो गए हैं। इनेलो से अलग होकर ओमप्रकाश चौटाला के पोते दुष्यंत चौटाला ने अलग पार्टी बनाई है। यह पार्टी भी सभी सीटों पर चुनाव लड़ रही है। भाजपा के पूर्व सांसद राजकुमार सैनी ने अलग लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी बनाई है और एक खास इलाके में उसके उम्मीदवार भी चुनाव लड़
रहे हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares