नागरिकता कानून वोट नुस्खा?

नागरिकता कानून में बदलाव क्या भाजपा के लिए चुनाव जीतने का रामबाण नुस्खा होगा? भाजपा के नेता ऐसा ही मान रहे हैं। उनको लग रहा है कि इससे हिंदू और मुसलमान का मुद्दा मुख्यधारा का मुख्य मुद्दा बनेगा। सामाजिक विभाजन बढ़ेगा, जिससे अंततः ध्रुवीकरण होगा और भाजपा को फायदा होगा। पर देश के ज्यादातर हिस्सों में क्या एक सी हवा बनेगी? कुछ मुश्किल है। पहला कारण यह है कि यह मुद्दा इतना जटिल है कि आम लोगों को पता ही नहीं है कि यह क्या है। संसद से लेकर सड़क तक लोग पढ़े-लिखे लोगों को खोज कर पूछ रहे हैं कि असल में यह क्या मुद्दा है और इससे उसके जीवन पर क्या असर होने वाला है। भाजपा, कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों के नेताओं तक को भी नहीं पता है।

जिस तरह से भाजपा के समर्थकों ने कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने से पहले सोशल मीडिया में यह नैरेटिव बनाया कि देश के लोग कश्मीर में जमीन खरीद सकेंगे और वहां की लड़कियों से शादी कर सकेंगे (भाजपा के एक राज्य सरकार के मंत्री ने भी यह बात कही थी) उस तरह का नैरेटिव इस मामले में नहीं बन सका है। असलियत है कि भाजपा इसके जरिए किसी किस्म का नैरेटिव नहीं बना पाई है। न तो लोग इसकी बारीकियों को जान, समझ रहे हैं और न इससे होने वाले फायदे का अंदाजा लगा पा रहे हैं। ऊपर से असम और त्रिपुरा के आंदोलन से इसका नुकसान लोगों की नजर में ज्यादा आया है।

पड़ोसी देशों से आने वाले लोगों को नागरिकता का मामला जनमानस में कश्मीर या मंदिर की तरह बैठा हुआ मसला नहीं है। इसके पीछे दशकों के प्रचार का इतिहास नहीं है। उस नाते यह पूरी तरह से पकने से पहले ही तोड़ा गया फल दिख रहा है। इससे आगे राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर बनना शुरू होगा, उससे विभाजन और बढ़ेगा। पर उसका नुकसान यह है कि नागरिकता प्रमाणित करने के लिए सबको लाइन में लगना होगा।

बहरहाल, एक तो मनोवैज्ञानिक या भावनात्मक रूप से यह मुद्दा लोगों को अपील नहीं कर रहा है और दूसरे भौगोलिक रूप से भी यह मुद्दा एक निश्चित इलाके में सिमटा हुआ है। दक्षिण भारत के राज्यों में नागरिकता कानून का कोई मुद्दा नहीं बनना है। विंध्य पर्वत के उस पार किसी राज्य की सीमा किसी दूसरे देश से नहीं लगती है और न अवैध घुसपैठ का वहां कोई मुद्दा रहा है। पूर्वोत्तर के राज्यों में हुई घुसपैठ का असर भी वहां नहीं हुआ है। इस बात की कभी चर्चा नहीं हुई है कि बांग्लादेशी मुसलमान किसी दक्षिणी राज्य में पहुंच गए और बस्ती बना ली, जिससे वहां की स्थानीय संस्कृति या जनसंख्या संरचना पर असर हुआ। इसलिए जिन राज्यों में अच्छी खासी मुस्लिम आबादी है, जैसे केरल, तेलंगाना या आंध्र प्रदेश वहां भी यह मुद्दा भाजपा को फायदा पहुंचाने वाला नहीं है। तमिलनाडु और कर्नाटक में भी नहीं।

उत्तर और पश्चिम भारत का जहा सवाल है कि एक तो इन राज्यों में भाजपा पहले से ही ज्यादातर सीटें जीती हुई है और दूसरे इन राज्यों में कभी भी अवैध घुसपैठ बड़ा मुद्दा नहीं रहा है। हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, जम्मू कश्मीर या पश्चिम के राज्यों में महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान आदि में अवैध घुसपैठ का या बांग्लादेशी मुसलमानों का मुद्दा कभी नहीं रहा है। इसलिए आम आदमी इस मुद्दे से कनेक्ट नहीं कर पा रहा है। उसको लग रहा है कि यह जबरदस्ती का बनाया हुआ मुद्दा है। ऊपर से यह मुद्दा ऐसे समय आया है, जब ज्यादातर लोग अपने जीवनकाल के सबसे गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। तभी यह धारणा भी बन रही है कि सरकार जान बूझकर लोगों का ध्यान भटकाने के लिए यह मुद्दा उठा रही है। लोग इस समय नागरिकता कानून की बजाय आर्थिक सुधार के बारे में सुनना चाहते हैं।

पूर्वी और पूर्वोत्तर में यह मुद्दा जरूर राजनीतिक रूप से संवेदनशील है। पर उसमें भी झारखंड, ओड़िशा या बिहार में इसका ज्यादा असर नहीं होने वाला है। इसके असर में आने वाला सबसे बड़ा इलाके पश्चिम बंगाल और असम से लेकर उसके आगे पूर्वोत्तर के राज्य हैं। इन राज्यों में इसका असर दिखना शुरू भी हो गया है।

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