पहेली मोदी-शाह के दिमाग की

मैं नरेंद्र मोदी-अमित शाह को सचमुच समझ नहीं पा रहा हूं। इसलिए कि मैं मानता रहा हूं कि इनका दिमाग खांटी कांग्रेस विरोधी था। ये कांग्रेस की एंटीथीसिस थे। कुछ भी हो नरेंद्र मोदी के दिमाग में इमरजेंसी से पहले और उस दौरान इंदिरा गांधी के राज, उनके तौर-तरीकों के खिलाफ विरोध-नफरत गहरा पैठा होगा! ऐसे ही अमित शाह के दिमाग में भी पहला और प्रमुख तत्व कांग्रेस विरोध है। इंदिरा गांधी से ले कर चिदंबरम के राज तक मोदी-शाह का दिमाग जैसे पका तो उससे स्वभाविक यह व्यवहार होना चाहिए कि इन्हे कांग्रेस जैसा नहीं होना था! कांग्रेस, चिदंबरम जो करते रहे उससे विपरीत ये करते।

मगर 25 नवंबर की सुबह जब मोदी-शाह के हाथो, उनकी कमान में आधी रात में राज्यपाल, राष्ट्रपति, केबिनेट, संविधान आदि का जिस तरह दुरूपयोग हुआ उससे पहेली बनी कि ये कांग्रेस के एंटीथीसिस या कांग्रेस का विकृत रूप। मोदी-शाह का ऐसा कैसे दिमाग! गलत फैसले होना, नोटबंदी जैसे काम होना, दलबदल, राजनैतिक चालबाजी आदि सबको समझा जा सकता है मगर नरेंद्र मोदी और अमित शाह के दिमाग का वैसा ही व्यवहार क्यों जैसे फखरूद्दीन अली अहमद से इंदिरा गांधी द्वारा आधी रात में इमरजेंसी के कागज पर दस्तखत करवाने या रामलाल जैसे राज्यपाल के पदों के दुरूपयोग वाला है तो आखिर कैसे? उन तरीकों को कैसे अपनाना जिसके खिलाफ नरेंद्र मोदी कभी सोचा करते थे। कैसे वह दिमाग अति कांग्रेसवादी बन सकता है जिसने जीवन भर गैर-कांग्रेसवाद की राजनीति की!

जो इंदिरा गांधी करती थी उससे बढ़ कर हमें करना है, जो चिदबंरम करते थे उससे बढ़ कर हमें करना है तो उसका अर्थ क्या यह नहीं हुआ कि सत्ता वह कारण है जिससे दिमाग का वह रसायन सूखा है जो कभी कांग्रेसी राज के तौर-तरीकों के खिलाफ आंदोलित हुआ करता था। 25 नवंबर 2019 की रात को नरेंद्र मोदी-अमित शाह ने जब विचार किया, फैसला किया तो इनके अवचेतन में क्यों यह बात नहीं आई कि कोश्यारी का रामलाल से भी गया गुजरा बनाना या राष्ट्रपति कोविंद से फखरूद्दीन अली अहमद जैसे काम करवाना बदनामी वाला होगा।मोदी-शाह के गोवा, कर्नाटक, हरियाणा आदि के प्रकरण इस नाते सहज है कि दलबदल, जोड़-तोड़, खरीदफरोख्त की गंदगी को फिर भी राजनैतिक दावपेंच में समझा जा सकता है। लेकिन आधी रात को संविधान और उसकी व्यवस्थाओं के दुरूपयोग का मामला अलग ही आयाम लिए हुए है। इसका अर्थ है कि मोदी-शाह का दिमाग अब सौ टका आज याकि वर्तमान की, तात्कालिकता में बंध गया है। न कांग्रेस राज के इतिहास की याद बची है और न भविष्य की चिंता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को 25 नवंबर की आधी रात में तनिक भी भान नहीं था कि राष्ट्रपति कोविंद या राज्यपाल कोश्यारी से जो वे करवा रहे है उससे उनके जीवन का क्या दाग बनेगा या पार्टी और खुद की कैसी बदनामी इतिहास में दर्ज होगी!

भला ऐसा कैसे? क्या ये मान बैठे हंै कि इनकी सत्ता अनंत है। मतलब भारत की सत्ता का स्थाई बापीपट्टा इनका हो गया है? ये मानते हंै कि लोगों के जहन में अपना पुण्य अपने हाथों लिखवा कर उसी को इतिहास बनवा डालेंगे।तब आश्चर्य नहीं जो बतौर गृह मंत्री अमित शाह मान रहे होंगे कि 25 नवंबर 2019 कीआधी रात को उन्होने जो किया उससे वे सरदार पटेल समतुल्य या उनसे बड़े फौलादी गृह मंत्री हो गए हंै! वे चाणक्य के दो हजार साल बाद हिंदूओं ने दूसरे चाणक्य हंै!

लाख टके का सवाल है कि मोदी-शाह का दिमाग क्यों नहीं यह फर्क करने की स्थिति में है कि क्या सही है और क्या गलत? क्या मर्यादा है और क्या अंहकार? क्या धर्म है और क्या अधर्म?

सोचंे,भला मनुष्य का व्यवहार ऐसा कैसे हो जाता है जो इतिहास, अनुभव और धर्म, संविधान, राजनीति के तमाम सत्य, मर्यादाओं को भूल कर अपनी फितरत में बंध जाता है? क्योंकर मोदी-शाह उन उद्धव ठाकरे के लिए सीएम की कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं हुए या शिवसेना एनसीपी-कांग्रेस के एलायंस को एक इंच जमीन छोड़ने को तैयार नहीं हुए जिसे छोड़ दिया जाता तो प्रलय नहीं आता बल्कि उलटे यह मान बनता कि छत्रपति शिवाजी की ध्वजा लिए शिवसेना को महाराष्ट्र का सूबेदार बनाने का मोदी-शाह ने पुण्य किया!

मगर मोदी-शाह ने महाभारत की याद ताजा कराई। भारत के और हम हिंदुओं के तमाम मसलों का जवाब कई मायनों में महाभारत में है। तो जाना जाए श्रीकृष्ण द्वारा धर्म की याद कराने पर दुर्योधन का यह कहा –
जानामि धर्म न च मे प्रवृत्तिर्जानाम्यधर्म न च मे निवृत्तिः ।
केनापि देवेन हृदि स्थितेन यता नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि ।।

मतलब दुर्योधन अपने दिमाग का खुलासा करते हुए कहता है कि मैं ‘मैं धर्म को जानता हूँ बावजूद इसके उसकी मेरी प्रवृत्ति नहीं है और अधर्म को भी जानता हूँ, पर उससे मेरी निवृत्ति नहीं है। मैं क्या करूं क्योंकि मेरे हृदय में कोई ‘देव’ याकि सांसारिक भूख, भोग और सत्ता संग्रह की वह कामना है जो मुझसे जैसा करवाती है, वैसा ही मैं करता जाता हूँ।

मैं कहां से कहां भटक गया लेकिन सोचंे साढ़े पांच सालों में भाजपा क्या से क्या हो गई। इसी सप्ताह भोपाल में कैलाश जोशी का देहांत हुआ। उन्हे याद करते हुए उन्हे सबने संत समान बताया। सोचंे, कैलाश जोशी, शेखावत, शांताकुमार, ठाकरे, वाजपेयी, आडवाणी, डा जोशी आदि असंख्य नामों वाली क्या एकदम अलग भाजपा हुआ करती थी और क्या आज मोदी-शाह की कांग्रेस से भी ज्यादा गंदगी लिए हुए भाजपा है जिसकी न सत्ता भूख का अंत है और न बेशर्मी की हद है!

3 thoughts on “पहेली मोदी-शाह के दिमाग की

  1. इंटरनेट से संवाद निकालने से बेहतर है आप खुद गीता को पढ़े और जितना पढ़े उतना समझें भी। फिर आप ये ऊलजुलूल कथन लिखना बन्द कर देंगे।
    कुंठित व्यक्ति है इस निबंध को लिखने वाला।

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