पंचायतों से भी फीके चुनाव!

हां, महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनाव को ले कर राष्ट्रीय कौतुक और चुनावी धमाल उतना भी नहीं है जितना राज्य विशेष के पंचायत चुनावों पर होता है। हिसाब से दोनों राज्यों में सत्ता और मुख्यमंत्री की कुर्सी को ले कर पहले बहुत कौतुक हुआ करता था। लेकिन पिछले पांच सालों में इन दोनों प्रदेशों की राजनीति ऐसी निराकार हुई है, मराठा और जाट आबादी का दबदबा ऐसे खत्म हुआ है कि मुख्यमंत्री के चेहरे से जो राजनैतिक हल्लेबाजी हुआ करती थी वह खत्म है। एक हिसाब से यह अच्छा है तो बुरा भी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा के टेकआवर के बाद प्रदेशों की राजनीति में दंबग जाति के प्रतिनिधि चेहरे को मुख्यमंत्री बनाने के बजाय निराकार और बिना जातीय वोट गणित के जैसे मुख्यमंत्री बनाए उससे सभी प्रदेशों में बहुत कुछ बदला है। देवेंद्र फ़डनवीस ब्राह्यण हंै और मनोहर लाल खट्टर पंजाबी तो इन दोनों के आगे मराठा और जाट वोटों की वह मारामारी नहीं है जिससे चुनाव जातिय राजनीति का अखाड़ा बने।

एक तरह से राष्ट्रीय राजनीति का प्रदेशों में प्रतिस्थापन पिछले पांच सालों का अनहोना मामला है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने दिल्ली की राजनीति के अंगद पांव में सभी प्रदेशों को कवर करा दिया है। तभी विधानसभा चुनावों का वह धमाल बन ही नहीं सकता है जो 2014 से पहले बना करता था। यह अच्छा भी है तो बुरा भी है। बुरा इसलिए क्योंकि प्रादेशिक, क्षेत्रिय, स्थानीय उम्मीदों, जरूरतों की इससे अनदेखी बनती है। ऊपर से भले सबकुछ सामान्य और सहज दिखें लेकिन चुपचाप असंतोष व उम्मीदों के फफोले पकते जाते है।

सो महाराष्ट्र में मराठा मन ही मन जो सोच रहे होंगे या दलित और मुसलमान, आदिवासी जो सोच रहे होंगे वह भले जम्मू-कश्मीर, एनआरसी, हिंदू-मुस्लिम विमर्श के आगे चर्चा में न आए लेकिन यदि चुनाव में ये अनसुने रहे तो आगे का वक्त खतरे लिए हुए होगा। बहराहल, पते की बात राष्ट्रीय स्तर पर प्रादेशिक चुनावों का अप्रासंगिक बनना है और इसका जिम्मेवार कारण मोदी-शाह की राष्ट्रीय कमान और उनके द्वारा प्रायोजित राष्ट्रीय नैरेटिव है। तभी विधानसभा के इन चुनावों में पंचायत चुनाव जैसी स्थानीयता भी उभरी हुई नहीं दिख रही है।

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