दूसरे क्षत्रप भी सीख रहे हैं

ऐसा नहीं है कि सिर्फ बिहार और उत्तर प्रदेश के क्षत्रप ही बदलती राजनीति से सबक ले रहे हैं। उत्तर भारत के साथ साथ पूर्वी व दक्षिण भारत के क्षत्रप भी भाजपा की ताकत को समझ रहे हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की लोगों के दिल में बन रही छवि को समझ रहे हैं। तभी पिछले चुनाव में कई क्षत्रपों ने नरेंद्र मोदी को निशाना नहीं बनाया। खुल कर उनके बारे में आलोचनात्मक बातें नहीं कीं। जितने क्षत्रपों ने इस नजरिए से प्रचार किया उनका प्रदर्शन बेहतर रहा और जिन्होंने मोदी-शाह को गालियां दीं और उनको निशाना बना कर प्रचार किया उनका प्रदर्शन खराब हुआ।

आंध्र प्रदेश के क्षत्रप नेता जगन मोहन रेड्डी इसकी मिसाल हैं। उन्होंने पूरे चुनाव प्रचार में मोदी के साथ होने का मैसेज दिया। चुनाव से पहले वे मोदी से मिले और 2017 के राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा उम्मीदवार का साथ दिया। हालांकि वे अपने राज्य में अपना ही एजेंडा चला रहे हैं, जो मोदी और भाजपा के एजेंडे से उलट है। जैसे मोदी हिंदी को बढ़ावा दे रहे हैं तो जगन मोहन ने अपने यहां अंग्रेजी अनिवार्य कराया है। पर वे लगातार यह संदेश देते हैं कि वे मोदी के साथ हैं। उनके उलट भाजपा के सहयोगी रहे चंद्रबाबू नायडू ने पूरे चुनाव में मोदी की आलोचना की। मोदी और शाह के विरोध पर उन्होंने चुनाव लड़ा। नायडू ने मोदी और शाह के विरोध में दूसरी पार्टियों को एकजुट करने का प्रयास किया तो उनका सफाया हो गया।

उसके पड़ोसी राज्य तेलंगाना में भी यहीं कहानी दोहराई गई। वहां के भी मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव मोदी के विरोधी नहीं रहे हैं। उलटे आम लोगों में यह मैसेज था कि वे मोदी की सरकार में शामिल होना चाहते हैं। इसका उनको फायदा मिला। तमिलनाडु में भी डीएमके भले यूपीए में है और कांग्रेस से तालमेल किया पर उसके नेता एमके स्टालिन ने कभी भी मोदी के ऊपर बड़ा हमला नहीं किया। उनके राज्य में भाजपा अन्ना डीएमके के साथ मिल कर लड़ रही थी फिर भी स्टालिन का हमला सिर्फ अन्ना डीएमके और मुख्यमंत्री पलानीसामी पर रहा। दूसरी ओर ममता बनर्जी पूरे चुनाव में मोदी और शाह पर हमला करते रहे। नतीजा यह हुआ कि वे पश्चिम बंगाल में पहले जीती अपनी 11 सीटें हार गईं। उनकी संख्या 34 से घट कर 23 पर आ गई और भाजपा दो से बढ़ कर 18 हो गई। लालू प्रसाद की पार्टी और हेमंत सोरेन की पार्टी भी साफ हुई तो कारण यहीं था कि उनका हमला भाजपा और मोदी के ऊपर था।

इन राज्यों के नतीजों से जाहिर है कि भाजपा और नरेंद्र मोदी हिंदुत्व की राजनीति का पर्याय बने हैं। उनकी काट इस बात में नहीं है कि उनको गालियां दी जाए, बल्कि इस बात में है कि उनके करिश्मे और छवि से प्रभावित होकर जो वोट उनके साथ गोलबंद हो रहा है, उसमें हिस्सेदारी बढ़ाई जाए। जो पार्टी इस तरह की राजनीति करेगी वहीं अंततः सर्वाइव करेगी। उसे मोदी की तारीफ भी नहीं करनी है और भाजपा की तरह की राजनीति भी नहीं करने लगगा है पर बहुसंख्यक हिंदू वोट में अपने प्रति सद्भाव बनाने का गंभीर प्रयास करना होगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares