सपा है अति आत्मविश्वास में!

दो राज्यों के विधानसभा चुनाव के साथ-साथ उत्तर प्रदेश में मिनी चुनाव भी हुए थे। राज्य की 11 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए थे। इनमें से तीन पर समाजवादी पार्टी जीती और ज्यादातर सीटों पर दूसरे स्थान पर रही। एक सीट पर कांग्रेस दूसरे स्थान पर रही। सबसे बुरी दशा बहुजन समाज पार्टी की रही। पांच महीने पहले लोकसभा की दस सीटें जीतने वाली पार्टी उपचुनाव में किसी भी सीट पर दूसरे स्थान पर नहीं आ सकी। 2017 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले सिर्फ दो विधानसभा सीटों पर उसके वोट प्रतिशत में इजाफा हुआ। दूसरी ओर 2017 के मुकाबले समाजवादी पार्टी के वोट शेयर में हर सीट पर इजाफा हुआ।

समाजवादी पार्टी ने जैदपुर की सुरक्षित सीट भाजपा से छीन ली। इसके अलावा सपा ने रामपुर और घोसी की सीट भी जीती। सबसे हैरान करने वाले नतीजे तीन सुरक्षित सीटों के थे। 11 सीटों के उपचुनाव में तीन सीटें सुरक्षित थीं। इनमें से जैदपुर और बल्हा सीट पर बसपा के वोट में जबरदस्त गिरावट आई। जैदपुर में तो 2017 के मुकाबले उसका वोट शेयर 19 फीसदी से घट कर आठ फीसदी रह गया। बल्हा में उसे 12 फीसदी का वोट नुकसान हुआ। जाहिर है बसपा का इस तरह कमजोर होना और प्रियंका गांधी वाड्रा के लगातार सक्रिय होने के बावजूद कांग्रेस का कुछ नहीं कर पाना सपा के लिए अच्छा संकेत है। इससे सपा नेताओं को मनोबल निश्चित रूप से बढ़ा होगा।

तभी अब ऐसा कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा बनाम सपा का आमने सामने का मुकाबला है। सपा के नेता यह बात ज्यादा कह रहे हैं। भाजपा भी इसका प्रचार करेगी क्योंकि उसने सपा को पूरी तरह से मुस्लिमपरस्त पार्टी बना दिया है। ध्यान रहे उपचुनाव में भी सबसे ज्यादा फोकस रामपुर की सीट पर था, जहां से आजम खां की पत्नी तंजीम फातिमा चुनाव लड़ रही थीं। इस सीट पर सपा को 49 फीसदी और भाजपा को 44 फीसदी वोट मिले। 93 फीसदी से ज्यादा वोट इन दो पार्टियों में बंटे। बसपा दो फीसदी वोट पर सिमट गई। ध्यान रहे 2017 के चुनाव में इस सीट पर हिंदू-मुस्लिम का नैरेटिव नहीं बना था तब भाजपा को सिर्फ 26 फीसदी वोट मिले थे पर उपचुनाव में 44 फीसदी से ज्यादा वोट मिले।

तभी अगर सपा इसी तरह अति आत्मविश्वास में रही यह मान कर चलती रही कि वह अकेले भाजपा का मुकाबला कर लेगी तो यह उसके लिए भी घातक होगा और समूचे विपक्ष के लिए भी होगा। इसकी भी एक झलक उत्तर प्रदेश के उपचुनाव में भी दिखी। गंगोह सीट पर भाजपा इसलिए जीती क्योंकि सपा, बसपा और कांग्रेस तीनों के बीच वोट बंट गए। गंगोह सीट पर भाजपा को 2017 में 38 फीसदी वोट मिले थे पर इस बार उपचुनाव में उसका वोट प्रतिशत घट कर 30 रह गया। फिर भी उसका उम्मीदवार इसलिए जीत गया क्योंकि इस सीट पर कांग्रेस मजबूती से लड़ी और उसके उम्मीदवार को 28 फीसदी वोट मिले। सपा को साढ़े 25 फीसदी और बसपा को 14 फीसदी वोट मिले।

इन तीन पार्टियों के वोट बंटने से भाजपा उन सीटों पर भी जीती, जहां उसका वोट प्रतिशत कम हुआ। हां, यह तय है कि उत्तर प्रदेश की आगे की राजनीति में समाजवादी पार्टी ही मुख्य विपक्ष के तौर पर लड़ेगी। इसलिए सबसे ज्यादा उसकी ही जिम्मेदारी बनती है कि वह विपक्ष के वोट बंटने से रोकने का प्रयास करे। पिछले कुछ दिन से चर्चा है कि शिवपाल यादव सपा में वापस लौटना चाहते हैं। ध्यान रहे पिछले दिनों उन्होंने प्रगतिशील समाजवादी पार्टी बना कर अलग राजनीति की हुई है। अगर सपा के नेता अति आत्मविश्वास में रहे और उनकी वापसी के प्रयासों पर सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी तो यह भी सपा के लिए नुकसानदेह हो सकता है।

अखिलेश यादव, मायावती और प्रियंका गांधी तीनों को यह ध्यान रखना होगा कि उत्तर प्रदेश का अगला चुनाव मामूली नहीं होगा। ढाई साल के बाद ही चुनाव होना है उससे पहले अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण हो जाने की पूरी संभावना है। सोचें, अगर भाजपा ने राम मंदिर का वादा पूरा कर दिया और अयोध्या में भव्य राम मंदिर बन गया तो उत्तर प्रदेश का माहौल कैसा होगा? ऊपर से भगवाधारी योगी आदित्यनाथ की राजनीति अपनी जगह है। तभी उस स्थिति के लिए तीनों विपक्षी पार्टियों को अभी से अपनी पोजिशनिंग करनी होगी। अच्छा है, जो कांग्रेस के नेताओं ने पोजिशनिंग शुरू कर दी है। कांग्रेस के नेता जितिन प्रसाद ने पिछले दिनों मंदिर निर्माण का समर्थन किया। सभी विपक्षी पार्टियों को अभी से इस पर अपनी लाइन तय करनी चाहिए।

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