विपक्ष ने निलंबन का विरोध किया

नई दिल्ली। राज्यसभा के आठ सांसदों का सभी विपक्षी पार्टियों ने विरोध किया है। कांग्रेस, लेफ्ट, तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी सहित सभी पार्टियों ने इस फैसले पर सवाल उठाया है और विरोध जारी रखने का संकल्प जाहिर किया है। गौरतलब है कि सोमवार को राज्यसभा के सभापति एम वेंकैया नायडू ने विपक्ष के आठ सांसदों को सत्र की बची हुई अवधि के लिए निलंबित कर दिया।

इसका विरोध करते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने ट्विट किया- आठ सांसदों को निलंबित किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। ये सरकार के तानाशाही रवैए को दिखाता है। इससे यह भी पता चलता है कि सरकार का लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास नहीं है। हम फासिस्ट सरकार के खिलाफ संसद और सड़क पर लड़ते रहेंगे।

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस फैसले का विरोध किया। उन्होंने मनमाने तरीके से कृषि विधेयक पास किए जाने का आरोप लगाते हुए सरकार का विरोध किया। उन्होंने ट्विट करके कहा कि लोकतांत्रिक भारत की जुबान बंद करने का सरकार का काम जारी है। उन्होंने कहा कि पहले विपक्ष को खामोश किया गया और बाद में सांसदों को निलंबित कर दिया गया। उन्होंने संसद से पास कृषि विधेयकों को काला कानून बताते हुए सरकार पर आरोप लगाया कि किसानों की समस्याओं पर आंख मूंद लिया है।

विपक्ष ने राष्ट्रपति से की अपील

संसद के दोनों सदनों से दो विवादित कृषि विधेयकों को पारित होने से रोकने में नाकाम रही विपक्षी पार्टियों ने अब राष्ट्रपति से अपील की है। 15 विपक्षी पार्टियों ने राष्ट्रपति को ज्ञापन देकर अपील की है कि वे इन विधेयकों पर दस्तखत नहीं करें। कांग्रेस, डीएमके, सीपीएम, जेडीएस सहित 15 विपक्षी पार्टियों ने अपनी चिट्ठी में लिखा है कि ये पार्टियां देश के अलग अलग हिस्से से हैं और अलग अलग समूहों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन पार्टियों ने कृषि संबंधी विधेयकों का विरोध करते हुए राष्ट्रपति से इस पर दस्तखत नहीं करें।

इन विपक्षी पार्टियों के अलावा सरकार की सहयोगी अकाली दल ने भी राष्ट्रपति से इस बिल पर दस्तखत नहीं करने की अपील की है। अकाली दल ने इस बिल का संसद में भी विरोध किया है और हरसिमरत कौर बादल ने सरकार से इस्तीफा दे दिया है। बहरहाल, अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल के साथ पार्टी के नेताओं ने किसान बिलों के मुद्दे पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से मुलाकात की। मीटिंग के बाद सुखबीर सिंह बादल ने बताया कि उन्होंने राष्ट्रपति से बिलों पर दस्तखत नहीं करने की मांग की है।

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