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ठोस प्रस्ताव के बगैर वार्ता नहीं

नई दिल्ली। केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसानों ने सरकार पर टालमटोल का रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए अपना रुख सख्त कर लिया है। सरकार की ओर से वार्ता के लिए दिए गए प्रस्ताव को खारिज करते हुए किसानों ने कहा है कि सरकार जब तक कोई ठोस प्रस्ताव नहीं देती है तब तक वार्ता नहीं होगी। किसान संगठनों ने बुधवार को किसान दिवस के रोज शाम साढ़े पांच बजे प्रेस कांफ्रेंस की और सरकार को अपना रुख बता दिया। किसानों ने यह भी कहा कि उन्हें सरकार से दान नहीं चाहिए, बल्कि अपनी फसलों के लिए उचित दाम चाहिए।

गौरतलब है कि केंद्रीय कृषि मंत्रालय के संयुक्त सचिव की ओर से रविवार को किसानों के एक प्रस्ताव भेजा गया था। उस पर दो दिन विचार के बाद बुधवार को किसानों ने कहा कि इसमें कोई नई बात नहीं है और जब तक सरकार ठोस प्रस्ताव नहीं देती है तब बातचीत का कोई मतलब नहीं है। बुधवार को किसानों की प्रेस कांफ्रेंस से दो घंटे पहले कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा था- किसान हमारे प्रस्ताव में जो भी बदलाव चाहते हैं, वो बता दें। हम उनकी सुविधा और समय के मुताबिक बातचीत के लिए तैयार हैं।

सरकार ने शाम चार बजे के करीब यह पेशकश की। हालांकि हालांकि, इसमें कोई मांग मंजूर करने का जिक्र नहीं किया। तभी इसके दो घंटे बाद यानी शाम छह बजे के करीब किसानों ने कहा- सरकार का ठोस प्रस्ताव क्या हो, यह हम कैसे बताएंगे। अगर वे पुरानी बातों को ही बार-बार दोहराएं तो बात नहीं बनेगी। सरकार ने किसानों को 10 बिंदु एक का प्रस्ताव भेजा था, जिसे किसान ठुकरा चुके हैं।

प्रेस कांफ्रेंस में किसान संगठनों ने कहा- यह कह कर गुमराह किया जा रहा है कि हम बातचीत नहीं कर रहे हैं। किसान हमेशा बातचीत को राजी हैं, जब भी बुलाया गया हम गए और आगे भी जाएंगे। सरकार ठोस प्रस्ताव लिख कर दे तो हम बातचीत करेंगे। बातचीत से नतीजा हासिल करने के लिए सरकार को अनुकूल माहौल बनाना चाहिए। किसानों ने सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई का हवाला देते हुए कहा- सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि इन कानूनों को लागू करने की तारीख टाल दी जाए। ऐसे में बातचीत के लिए बेहतर माहौल बनेगा।

किसान संगठनों ने कह- सरकार को अड़ियल रुख छोड़ कर किसानों की मांगें मान लेनी चाहिए। हम अमित शाह जी को पहले ही बता चुके हैं कि आंदोलन कर रहे किसान संशोधनों को स्वीकार नहीं करेंगे। प्रेस कांफ्रेंस में योगेंद्र यादव ने कहा- आज तक किसी भी मीटिंग हमने नहीं कहा कि कानून में संशोधन पर विचार करना चाहिए। एक ही राय है कि कानून रद्द हो। गेंद सरकार के पाले में है, जो कुछ नहीं करना चाहती। वह हमारे पाले में गेंद फेंक रही है, जबकि गेंद तो शुरू से केंद्र सरकार से ही पाले में है। हमें दान नहीं चाहिए, दाम चाहिए। हमें फसलों की कीमत पर लीगल गारंटी चाहिए।

सरकार को भेजा लिखित जवाब

प्रेस कांफ्रेंस करके केंद्र सरकार के प्रस्ताव का जवाब देने के बाद किसान संगठनों ने बुधवार को कृषि मंत्रालय के संयुक्त सचिव के पत्र का लिखित जवाब भी भेज दिया। संयुक्त किसान मोर्चा की ओर से किसान नेता डॉ. दर्शनपाल ने केंद्रीय कृषि व किसान कल्याण मंत्रालय के संयुक्त सचिव विवेक अग्रवाल को पत्र लिखा है। इसमें किसान नेता ने केंद्र सरकार के रवैए पर गंभीर सवाल उठाए हैं और उसकी नीयत पर शंका जाहिर की है।

इसमें मंत्रालय के 20 दिसंबर के पत्र का जिक्र करते हुए कहा गया है- हमें अफसोस है कि इस पत्र में आपने यह पूछा है कि हमारा पिछला पत्र केवल एक व्यक्ति का मत है या कि सभी संगठनों का यही विचार है। हम आपको बता देना चाहते हैं कि डॉ. दर्शनपाल जी के नाम से भेजा गया पिछला पत्र और यह पत्र संयुक्त किसान मोर्चा के इस आंदोलन में शामिल सभी संगठनों द्वारा लोकतांत्रिक चर्चा के बाद सर्वसम्मति से बनी राय है। इसके बारे में सवाल उठाना सरकार का काम नहीं है।

इसमें आगे लिखा गया है- हमें बहुत दुख के साथ यह भी कहना पड़ रहा है कि भारत सरकार के अन्य कई प्रयासों की तरह आपका यह पत्र भी किसान आंदोलन को नित नए तरीकों से बदनाम करने का प्रयास है। यह किसी से छुपा नहीं है कि भारत सरकार पूरे देश के किसानों के शांतिपूर्ण, जमीनी और कानूनसम्मत संघर्ष को अलगाववादियों और चरमपंथियों के रूप में पेश करने, संप्रदायवादी और क्षेत्रीय रंग में रंगने और बेतुका व तर्कहीन शक्ल में चित्रित करने की कोशिश कर रही है।

किसानों की मांग स्पष्ट करते हुए इसमें कहा गया है- किसानों के प्रतिनिधियों ने तीन केंद्रीय कृषि कानूनों की नीतिगत दिशा, दृष्टिकोण, मूल उद्देश्यों और संवैधानिकता के संबंध में बुनियादी मुद्दों को उठाते हुए इन्हें निरस्त करने की मांग की है। लेकिन सरकार ने चालाकी से इन बुनियादी आपत्तियों को महज कुछ संशोधनों की मांग के रूप में पलट कर पेश करना चाहा है। हमारी कई दौर की वार्ता के दौरान सरकार को स्पष्ट रूप से बताया गया कि ऐसे संशोधन हमें मंजूर नहीं हैं।

इसमें यह भी कहा गया है कि सरकार के प्रस्ताव में एमएसपी की लीगल गारंटी की कोई स्पष्ट बात नहीं है। किसानों ने यह भी लिखा है कि सरकार के प्रस्ताव में बिजली कानून संशोधन विधेयक के बारे में कही बात भी अस्पष्ट है। किसान नेता ने लिखा है- हम आपको आश्वस्त करना चाहते हैं कि प्रदर्शनकारी किसान और किसान संगठन सरकार से वार्ता के लिए तैयार हैं और इंतजार कर रहे हैं कि सरकार कब खुले मन, खुले दिमाग और साफ नीयत से इस वार्ता की आगे बढ़ाए।

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