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तीनों कृषि कानूनों हो रद्द

नई दिल्ली। केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसान संगठनों ने कहा है कि अगर सरकार उनकी मांगें नहीं मानती है और तीनों कानूनों को रद्द नहीं करती है तो आर-पार की लड़ाई होगी। भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत गुरुवार को दिल्ली-यूपी गेट पर चल रहे प्रदर्शन में शामिल होने पहुंचे। उन्होंने सरकार को चेतावनी देने के अंदजा में कहा कि दिल्ली में 26 जनवरी को अब तक नकली झांकियां निकाली जाती थीं, लेकिन इस बार किसानों की असली झांकी भी परेड में शामिल होगी। इससे ऐसा लग रहा है कि अब तक दिल्ली की सीमा पर बैठे किसान दिल्ली मार्च भी कर सकते हैं।

इस बीच गुरुवार को दिल्ली-यूपी गेट पर उत्तर प्रदेश की 18 खाप पंचायतों की बैठक हुई। इस महापंचायत में किसान आंदोलन को समर्थन देने का ऐलान किया गया। भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष और बालियान खाप के प्रमुख चौधरी नरेश टिकैत ने कहा- अब तक दिल्ली में 26 जनवरी को नकली झांकियां निकाली जाती थीं, लेकिन इस बार किसानों की असली झांकी भी परेड में शामिल होगी। उन्होंने कहा- अगर सरकार कृषि कानून वापस नहीं लेती तो आने वाले चुनाव में भाजपा को बड़ा नुकसान होगा।

नरेश टिकैत ने कहा- किसानों की समस्या का हल नहीं निकला तो आर-पार की लड़ाई लड़ी जाएगी। सरकार किसान संगठनों के फूट डालने की कोशिश कर रही है। सरकार को सर्वदलीय बैठक बुला कर समाधान निकालना चाहिए। इस बीच दिल्ली ट्रैफिक पुलिस के हवाले से खबर आई है कि दिल्ली-गाजीपुर बॉर्डर को पूरी तरह से बंद कर दिया गया है और इस रास्ते का इस्तेमाल करने वालों से अपील की गई है कि वे वैकल्पिक रास्ते का इस्तेमाल करें। एक्सप्रेस वे की भी एक लेन ट्रैफिक के लिए बंद थी। अब दोनों बंद कर दी गई है।

यह भी कहा जा रहा है कि दिल्ली-यूपी के चिल्ला बॉर्डर को भी बंद करने की नौबत आ सकती है। गुरुवार को दोपहर भारतीय किसान यूनियन अंबावत के कार्यकर्ता चिल्ला बॉर्डर पहुंचे, लेकिन पुलिस ने बॉर्डर से पहले ही कंट्रोल रूम के पास उनको रोक लिया। इससे नाराज किसान सड़क पर ही धरने पर बैठ गए। अगर किसानों का पीछे से आना जारी रहता है तो इस बॉर्डर को भी बंद करने की नौबत आ सकती है।

प्रदर्शन का है अधिकार- सुप्रीम कोर्ट

तीन केंद्रीय कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसान संगठनों और केंद्र सरकार दोनों को सुप्रीम कोर्ट ने सलाह दी है। सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि वह प्रदर्शन करने के किसानों के अधिकार को कम नहीं कर सकता है लेकिन उसकी सलाह है कि किसान आंदोलन का तरीका बदलें। इसी तरह सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि वह कृषि कानूनों को स्थगित करने पर विचार करे। हालांकि अदालत ने साफ कर दिया कि अभी वह कानूनों का वैधता पर विचार करने की बजाय आंदोलन पर ही विचार करेगी। हालांकि अदालत ने बातचीत के लिए कमेटी बनाने की बात पर फिर जोर दिया।

चीफ जस्टिस एसए बोबड़े की बेंच के सामने गुरुवार को लगातार दूसरे दिन कृषि कानूनों और किसान आंदोलन से जुड़ी याचिकों पर विचार किया गया। चीफ जस्टिस बोबड़े ने कहा- हम अभी कृषि कानूनों की वैधता पर फैसला नहीं करेंगे। हम किसानों के प्रदर्शन और नागरिकों के बुनियादी हक से जुड़े मुद्दे पर ही फैसला सुनाएंगे। अदालत ने कहा- हम कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन करने के बुनियादी हक को मानते हैं और इसे छीनने का कोई सवाल नहीं उठता। बात सिर्फ यही है कि इससे किसी की जान को खतरा नहीं होना चाहिए।

सर्वोच्च अदालत ने कहा- किसानों को प्रदर्शन का हक है। हम उसमें दखल नहीं देंगे, लेकिन प्रदर्शन के तरीकों पर हम गौर करेंगे। हम केंद्र से कहेंगे कि जिस तरह से प्रदर्शन किया जा रहा है, उसमें थोड़ी तब्दीली लाएं ताकि इससे आवाजाही करने के नागरिकों के अधिकार पर असर न पड़े। बेंच ने कहा- प्रदर्शन करना तब तक संवैधानिक है, जब तक कि उससे किसी की संपत्ति को नुकसान न पहुंचे या किसी की जान को खतरा न हो।

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों को सलाह देते हुए कहा- केंद्र सरकार और किसानों को बातचीत करनी चाहिए। हम इस पर विचार कर रहे हैं कि एक निष्पक्ष और स्वतंत्र कमेटी बनाई जाए ताकि दोनों पक्ष उसमें अपनी बात रख सकें। यह कमेटी जिस फैसले पर पहुंचेगी, उसे माना जाना चाहिए। तब तक प्रदर्शन जारी रखा जा सकता है। इस कमेटी में पी साईनाथ, भारतीय किसान यूनियन जैसे लोगों को मेंबर बनाया जा सकता है।

किसानों से हमदर्दी दिखाते हुए सर्वोच्च अदालत ने कहा- बातचीत से आपका मकसद पूरा हो सकता है। धरने पर बैठे रहने से मदद नहीं मिलेगी। हम भी भारतीय हैं। हम किसानों की हालत से वाकिफ हैं। आपके मकसद से हमदर्दी रखते हैं। आपको सिर्फ अपने विरोध का तरीका बदलना है। हम भरोसा देते हैं कि आपकी बात सुनी जाएगी। अदालत ने केंद्र से कहा- केंद्र सरकार इस पर सोचे कि कानून पर फिलहाल रोक लगाने की क्या संभावनाएं हैं। क्या सरकार सुप्रीम कोर्ट को यह भरोसा दिला सकती है कि इस मामले की सुनवाई होने तक वह कानून को अमल में नहीं लाएगी?

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