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मनमोहन ने की विधेयकों को प्रवर समिति में भेजने की वकालत

नई दिल्ली। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विधेयकों में संशोधन तथा उनमें सुधार में राज्यसभा की प्रवर समितियों की भूमिका की सराहना करते हुए कहा है कि उच्च सदन में आने वाले विधेयकों को पहले प्रवर समिति में भेजने की परंपरा का अनुसरण होना चाहिए।

डा़ सिंह ने राज्यसभा के 250 सत्र पूरे होने के मौके पर राज्यसभा की भूमिका पर आज सदन में हुई चर्चा में हिस्सा लेते हुए कहा कि उच्च सदन में लगभग तीन दशक के अपने अनुभव के आधार पर वह कह सकते हैं कि प्रवर समितियों ने विधेयकों में सुधार और संशोधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है और इसलिए उनका मानना है कि इस सदन में आने वाले विधेयकों को पहले प्रवर समितियों में भेजा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सदन में समितियों में विधेयकों को कसौटी पर परखे जाने से ही इस सदन का दायित्व पूरा होता है। समितियों में केवल सदस्य ही अपना दिमाग नहीं लगाते बल्कि विशेषज्ञ और संबंधित पक्ष भी अपनी बात रखते हैं।

उन्होंने कहा कि 16 वीं लोकसभा में केवल 25 फीसदी विधेयक ही समितियों में भेजे गये जबकि 15 और 14 वीं लोकसभा में यह आंकडा क्रमश 71 और 60 फीसदी था। उन्होंने जोर देकर कहा कि दूसरा सदन कुछ भी करे यह जरूरी है कि हमारे सदन के लिए प्रवर समिति का गठन होना चाहिए जिससे कि विधेयकों की जांच-परख हो सके। राज्यसभा को दरकिनार कर धन विधेयकों को पारित कराने की हाल की प्रवृति को अनुचित बताते हुए उन्होंने कहा कि हाल के समय में कार्यपालिका ने संविधान के अनुच्छेद 110 का दुरूपयोग कर कई महत्वपूर्ण विधेयकों को बिना चर्चा के पारित कराया है।

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​उन्होंने कहा कि सत्ता पक्ष को इस तरह की स्थिति से बचना चाहिए। इससे राज्यसभा सहित हमारे सभी संस्थानों का महत्व कम होता है।
पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा कि राज्यसभा स्थायी सदन है और इसे इस तरह बनाया गया है कि दो वर्ष में इसके केवल एक तिहायी सदस्य ही सेवानिवृत होते हैं। इसलिए यह सदन कभी भंग नहीं होता इससे सदन को विधेयकों की गुणवत्ता बढाने की ताकत मिलती है। उन्होंने कहा कि राज्यसभा के पहले सभापति डा राधाकृष्णन ने पहली ही बैठक में कहा था कि यह केवल विधायी संस्था ही नहीं यह चर्चा का मंच है।

इसलिए हमें इसमें चर्चा के माध्यम से बहुमूल्य योगदान देना चाहिए। सदस्यों को देश की जनता के सामने संसद के दूसरे चैम्बर का औचित्य साबित करते हुए दिखाना चाहिए कि जल्दबाजी में बनाये गये कानूनों में सुधार के लिए दूसरा सदन जरूरी है।​ कुछ लोगों द्वारा राज्यसभा की आलोचना का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यह उच्च सदन की भूमिका को भ्रमित करने जैसा है। इस सदन का दायित्व है कि कोई भी कानून जल्दबाजी और केवल भावुकता में नहीं बनाया जाये।

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