कांग्रेस के थे, एक झटके में भाजपा के सितारे बन गए

ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार को गिराकर वीरतापूर्ण कार्य किया है। वह पहले कांग्रेस के सितारे थे। अब एक झटके में भाजपा के सितारे बन गए हैं। वह सिंधिया राजघराने के महाराज हैं, लेकिन कांग्रेस के महाराज नहीं बन पाए। जब तक कांग्रेस सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के अधीन है, तब तक यह संभव भी नहीं है।

राहुल गांधी से ज्योतिरादित्य ने मित्रता के संबंध बना लिए थे। उसका भी असर नहीं हुआ। मध्य प्रदेश में कांग्रेस जीती तो कमलनाथ मुख्यमंत्री बन गए। ज्योतिरादित्य को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष तक नहीं बनाया। महाराजा का अपमान और कब तक होता रहता?

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मध्य प्रदेश में कांग्रेस की राजनीति में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह का दबदबा है। दोनों मिलकर ज्योतिरादित्य को आगे बढ़ने ही नहीं दे रहे थे। ज्योतिरादित्य की उम्र निकली जा रही है। बेटा बड़ा हो रहा है। उसको भी राजनीति में स्थापित करना है। ज्योतिरादित्य को भरोसा हो चला था कि मध्य प्रदेश में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के रहते उनका राजनीतिक भविष्य ठीक नहीं दिख रहा है, इसलिए उन्होंने मौका देखकर भाजपा का दामन थाम लिया। उनकी दादी विजया राजे सिंधिया कांग्रेस छोड़कर जनसंघ में शामिल हुई थी। उनके पिता माधवराव सिंधिया भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए थे। ज्योतिरादित्य कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो रहे हैं। वे सत्ता में बने रहने की खातिर वही कर रहे हैं, जो उनके पूर्वजों ने किया था।

सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि राजघरानों की हायरार्की में ज्योतिरादित्य का दर्जा दिग्विजय सिंह से बड़ा है। आजादी से पहले सिंधिया के राज में दिग्विजय सिंह के पूर्वज राघौगढ़ रियासत के प्रमुख थे। आजादी के बाद राजघराने विदा हो गए। लोकतंत्र बन गया। लोकतंत्र की राजनीति में दिग्विजय सिंह का कद ज्योतिरादित्य से बहुत ऊंचा है। यह बात ज्योतिरादित्य को अवश्य अखरती होगी कि मेरी रियासत संभालने वाले का कद मेरे से ऊंचा कैसे? दिग्विजय सिंह और कमलनाथ की जुगलबंदी ऐसी जमी कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद भी ज्योतिरादित्य को कोई महत्व नहीं मिला।

जबकि वह महाराजा होने के कारण महत्व के हकदार थे। ज्योदिरादित्य ने सही किया या गलत, इसका मूल्यांकन समय करेगा। फिलहाल तो ज्योतिरादित्य ने अपने टोली के विधायकों के साथ कांग्रेस छोड़कर धोबीपाट मार दिया है, जिससे कमलनाथ की सरकार संकट में आ गई है। देखना है कमलनाथ और दिग्विजय सिंह इस नई परिस्थिति से किस तरह निबटते हैं और मध्य प्रदेश में फिर से भाजपा की सरकार बन पाती है या नहीं।

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