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नीतीश-प्रशांत की कट्टी से राजनीति में नई करवट

नीतीश कुमार और प्रशांत किशोर की कट्टी से बिहार की राजनीति बदलेगी। नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री हैं, जनता दल-यू के नेता हैं।

नीतीश कुमार बिहार के स्थायी राजनीतिज्ञ हैं, जबकि राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर राजनीति के बियाबान में भटके हुए मुसाफिर हैं। पहले उन्होंने नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के लिए काम किया। दोनों को बहुमत मिला।

केंद्र में सरकार मिल गई। यह सब होने के बाद भाजपा के दोनों महान नेताओं से प्रशांत किशोर को संकेत मिला कि जहां हैं वहीं रहें, देश को एक-दो से ज्यादा महत्वाकांक्षी लोगों की जरूरत नहीं है। निराश प्रशांत किशोर कांग्रेस के लिए अपनी सेवाएं देने लगे।

उत्तर प्रदेश में फेल हुए, जबकि पंजाब में कांग्रेस की सरकार बन गई। उसके बाद वह नीतीश कुमार के साथ जुड़ गए थे। नीतीश कुमार ने उन्हें मंत्री का दर्जा दिया था। पता नहीं क्या हुआ कि प्रशांत किशोर उखड़ गए। अब वह नीतीश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोलने पर उतारू हैं। एक अभियान शुरू कर उससे दस लाख लोगों को जोड़ने की बात कर रहे हैं। इसके अलावा वे सभी राजनीतिक पार्टियों से संपर्क बनाए हुए हैं। वे अपनी सेवाएं किसी भी पार्टी को दे सकते हैं।

पहली बार उन्होंने अपनी विशेषज्ञ सेवाएं भाजपा को दी थी। भाजपा को भारी सफलता मिली। इसके बावजूद प्रशांत किशोर को भाजपा से अलग क्यों होना पड़ा? इसके गंभीर कारण अवश्य होंगे, जो कि अज्ञात हैं। प्रशांत किशोर के बयानों से यह समझ में आता है कि वह नीतीश कुमार के भाजपा की गोद में बैठे रहने से नाराज है। उनका सवाल है, गांधी, जयप्रकाश और लोहिया के आदर्शों की बात करने वाले गोडसे की विचारधारा का समर्थन करने वालों के साथ कैसे रह सकते हैं? इसका अर्थ यही हुआ कि प्रशांत किशोर को विचारधाराओं में अंतर बहुत बाद में समझ में आया। अतीत में तो वह भी गोडसे की विचारधारा वालों के लिए काम कर चुके हैं। शायद उन्हें गलती समझ में आ गई।

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