शाहीन बाग में खबरों की तलाश

खबरें अपने आप पैदा होती हैं और अपने आधार से टूटकर उड़ती हैं। पत्रकार उनको पकड़ते हैं और अखबारों या टीवी चैनलों के जरिए जनता के सामने लाते हैं। बड़े अखबारों के तौर तरीके बदल गए।

उन्होंने उड़ती खबरें पकड़कर छापने वाली पत्रकारिता से पीछा छुड़ा लिया। वे सरकार के अनुकूल खबरें छापने लगे। समाचार चैनलों का भी यही हाल है। उड़ती खबरें पकड़ कर जनता के सामने लाने का सिलसिला अब करीब करीब बंद है।

इसके बावजूद जिनको उड़ती खबरें पकड़ने की लत है, वे खबरों को सोशल मीडिया के जरिए जनता के सामने ला रहे हैं। यू ट्यूब पर समाचारों के कई चैनल बड़ी संख्या में देखे जा रहे हैं और फेसबुक पर भी ऐसी तमाम खबरें आ रही हैं, जो किसी अखबार में चैनल में नहीं दिखती।

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इन दिनों ऐसे कई पत्रकारों का रुख दिल्ली के शाहीन बाग की तरफ है। वहां क्या हो रहा है? 15 दिसंबर से सीएए और एनआरसी के खिलाफ धरना शुरू हुआ था, जो अब तक जारी है। जितने लोग धरना देकर बैठे हैं, उससे ज्यादा पुलिस के जवान इलाके में चारों तरफ तैनात हैं। धरना देने वालों में मध्यमवर्गीय लोग हैं, महिलाएं हैं, बच्चे हैं, मुसलमान ज्यादा हैं।

धरना अब तक जारी है जिसे दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा की प्रचार शैली के कारण बड़े आंदोलन का रूप मिल गया है। निहत्थे निम्न मध्मवर्गीय लोग इस भावना के साथ धरने पर बैठे हैं कि हम कहां जाएंगे? यहीं मरना है। वे नागरिकता संशोधन कानून पारित होने के बाद भयभीत हैं। उनकी समस्या सुनने की बजाय सरकार आक्रामक मुद्रा में है। दिल्ली के चुनाव हो चुके हैं। आम आदमी पार्टी फिर से जीत चुकी है। आंदोलन वैसा ही जारी है, जैसा 15 दिसंबर को शुरू हुआ था।

भाजपा नेता इसे देश विरोधी ताकतों के इशारे पर चलाया जा रहा आंदोलन बता रहे हैं। अब एक तरफ शाहीन बाग का आंदोलन है, दूसरी तरफ सरकार की जिद। इस घमासान में देश के बाकी गंभीर मुद्दे ठंडे बस्ते में। घमासान के बीच सरकारी खजाना खाली करने का काम जोरों पर। भारतीय लोकतंत्र में यह क्या हो रहा है? एक तरफ जनता को धार्मिक उन्माद में फंसाने का काम, दूसरी तरफ बहुमत के नाम पर देश के साथ ठगी। देश आजाद होने के सत्तर साल बाद पहली बार इस तरह के दिन देखने पड़ रहे हैं। हे राम।

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