जो दादी ने किया था, 57 साल बाद वही पोते ने किया

मध्य प्रदेश में वही हुआ, जिसकी आशंका बहुत पहले से थी। मध्य प्रदेश की राजनीति में ज्योतिरादित्य सिंधिया का दबदबा नहीं बन पा रहा था। कमलनाथ और दिग्विजय सिंह जैसे सीनियर नेताओं के कारण उनकी धमक नहीं बन पा रही थी। यहां तक कि उन्हें मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भी नहीं बनाया जा रहा था। ज्योतिरादित्य सिंधिया के मन में खदबदाता हुआ असंतोष होली पर फूट पड़ा और वह मोदी-शाह शरणम गच्छामि हो गए। सिंधिया परिवार की राजनीति में पहले से पाला बदलने की परंपरा है।

विजया राजे सिंधिया 1957 में कांग्रेस के टिकट पर शिवपुरी (गुना) लोकसभा सीट से चुनाव जीती थी। बाद में वह जनसंघ में शामिल हो गई। उन्होंने 1967 में तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारिका प्रसाद मिश्रा की सरकार गिराई थी और जनसंघ के विधायकों के समर्थन से गोविंद नारायण सिंह संयुक्त विधायक दल की सरकार के मुख्यमंत्री बने थे।

विजयाराजे के पुत्र, ज्योतिरादित्य के पिता माधवराव सिंधिया ने 1971 में जनसंघ के टिकट पर गुना से चुनाव जीता था। वह 1980 में कांग्रेस में शामिल हो गए। विजयाराजे के बेटी वसुंधरा राजे और यशोधरा राजे भाजपा में हैं। वसुंधरा राजे केंद्र में मंत्री और दो बार राजस्थान की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। यशोधरा राजे मध्य प्रदेश में मंत्री रह चुकी हैं। अब ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होकर सत्तावन साल पुराना इतिहास दोहरा रहे हैं, जब उनकी दादी ने कांग्रेस सरकार गिराई थी। अब पोता कांग्रेस सरकार के लिए संकट बन गया है। ज्योतिरादित्य सिंधिया साबित कर रहे हैं कि देश की राजनीति में उनके परिवार का कितना महत्व है। यह देखना रोचक और मनोरंजक होगा कि भाजपा में उन्हें कितना महत्व मिलता है।

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