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अयोध्याः अभी मौका है

राम मंदिर और बाबरी मस्जिद के मामले को सर्वोच्च न्यायालय ने अब दो महिने आगे खिसका दिया है। दो महिने बाद भी कितने महिनों तक इस पर बहस चलेगी और इसका फैसला आने में कितने साल लगेंगे, किसी को कुछ पता नहीं। सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील का कहना है कि इसका फैसला 2019 के संसदीय चुनाव के बाद किया जाए तो बेहतर होगा। 

विभिन्न भाषाओं में उपलब्ध इस मामले के हजारों दस्तावेजों को हिंदी और अंग्रेजी में करना भी लंबे समय की मांग करता है। इसके अलावा फैसला कैसा भी हो, उसे लागू करना तो सरकार का काम है। अदालतों के सैकड़ों फैसले हैं, जिन्हें आज तक कोई भी सरकार लागू नहीं कर पाई। ऐसे में सभी विवादी पक्ष, पता नहीं क्यों, सिर्फ अदालत के फैसले पर जोर दे रहे हैं ? क्या वे कैसे भी फैसले को मान लेंगे ? 

हिंदू संगठनों ने कह दिया है कि मंदिर तो वहीं बनेगा। यदि फैसला ऐसा हो कि मस्जिद भी वहीं बने तो क्या वे मान लेंगे? यदि मस्जिद सरयू नदी के पार या लखनऊ में बन जाए (जैसा कि शिया लोगों का सुझाव है) तो क्या मुसलमान मान लेंगे? 

बेहतर तो यह होगा कि सर्वोच्च अदालत में बहस चले, उसी दौरान हिंदू और मुस्लिम संगठन आपस में भी संवाद चलाएं। यह असंभव नहीं कि अदालत के फैसले के पहले ही सर्वमान्य समझौता हो जाए। अभी भी मौका है। अफसोस है कि राज्य और केंद्र सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी हैं। अगर अदालतों के फैसलों पर अमल आसान होता तो अदालतें इतने नाजुक मामले को इतना लंबा लटकाती क्यों? अदालतों को पता है कि डंडे के जोर पर यदि उसके फैसले पर अमल करवाया गया तो इस देश का ढांचा ही चरमराने लगेगा। विदेशों में भी भारत की छवि चौपट हुए बिना नहीं रहेगी। खुद अदालतों की प्रतिष्ठा पैंदे में बैठ जाएगी। भगवान की भक्ति के लिए बने मंदिर और मस्जिद शैतान के शरण-स्थल बन जाएंगे। अयोध्या का अर्थ है- जहां युद्ध न हो, जहां खून न बहे, जहां शांति हो, प्रेम हो। क्या हमारी सरकारें, हमारे नेता, हमारे साधु-संत, हमारे मुल्ला-मौलवी इस दिशा में भी कुछ कर रहे हैं ?

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