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शाकाहार करें, बेहतर इंसान बनें

आजकल अपने देश में इस मुद्दे पर काफी बहस चल रही है कि लोग क्या खाएं और क्या न खाएं? हमारे प्रधानमंत्री ने भी कह दिया है कि खाने-पीने का संस्कृति से कोई संबंध नहीं है। यह बड़ी मजेदार बात है कि हमारे हिंदुत्ववादी नेता भी पर्यटन मंत्री अल्फोंस के चेले बनते जा रहे हैं। अल्फोंस ने भाजपा सरकार के मंत्री बनते ही बयान दे दिया कि गोमांस खाने में क्या बुराई है?

इस बयान को वे तरह-तरह से कई बार दोहरा चुके हैं लेकिन उन्हें अपना बाल भी बांका होने का डर नहीं है। मैं खुद मानता हूं कि किसी के साथ कोई जबर्दस्ती नहीं होनी चाहिए। जो कोई जो कुछ खाना चाहे, जरुर खाए बशर्ते कि वह उसे हजम कर सके। जो लोग शाकाहारी हैं, वे इसलिए शाकाहारी नहीं है कि उन्होंने शाकाहार की अच्छाइयों को समझकर उसे अपनाया है। वे इसलिए शाकाहारी हैं कि उनका परिवार शाकाहारी है। उन्हें शाकाहार परंपरा में मिला है। 

इसी तरह जो मांसाहारी हैं, वे भी अपनी परंपरा के कैदी हैं। इसलिए आहार की आदतों को लेकर किसी की निंदा या प्रशंसा करना उचित नहीं है लेकिन कौनसा आहार मनुष्यों के लिए उचित है और कौनसा नहीं, इस पर तो चर्चा अवश्य होनी चाहिए। इसी दृष्टि से देखें तो मांसाहार मनुष्यों के लिए तो सर्वथा त्याज्य है। निरामिष होना सुसंस्कृत और सभ्य होने का प्रमाण है। कोई पशु अपनी मर्जी के मुताबिक आहार नहीं कर सकता। शेर घांस नहीं खा सकता और हिरण मांस नहीं खा सकता। उनके पास विकल्प नहीं है लेकिन मनुष्य ऐसा प्राणी है, जिसके पास विकल्प है। यदि है तो वह बेहतर विकल्प क्यों न चुने? 

शाकाहार स्वास्थ्यप्रद, सुलभ और सस्ता है जबकि मांसाहार हानिकर, दुर्लभ और मंहगा है। हिंसा के बिना वह संभव नहीं। इसके अलावा आहार मनुष्य के चित्त, स्वभाव और आचरण को भी प्रभावित करता है। अपने यहां आहार की तीन श्रेणियां हैं। सात्विक, राजसिक और तामसिक। मांसाहार तामसिक है। मांसाहार को किसी धर्म में अनिवार्य नहीं बताया गया है। जिन धर्मों में पशु-बलि या कुर्बानी की प्रथा है, उनमें भी यह कहीं नहीं कहा गया है कि यदि कोई मांसाहार नहीं करेगा तो वह घटिया हिंदू या घटिया मुसलमान या घटिया ईसाई या घटिया यहूदी बन जाएगा। 

यदि आप शाकाहार की प्रतिज्ञा कर लें तो यह नहीं माना जाएगा कि आपने अपना धर्म-परिवर्तन कर लिया है। मुस्लिम देशों में मेरे कई मित्रों ने अपने आप मांस खाना छोड़ दिया है। ऐसा ही मेरे कई चीनी और जापानी मित्रों ने भी किया है। ऐसा ही भारत के कई राजपूत, आदिवासी और दलित मित्रों ने किया है। क्या वे धर्मभ्रष्ट हो गए हैं? नहीं, वे उच्चतर मानव बने हैं, बेहतर इंसान बने हैं।

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