अपने-अपने भ्रष्टाचारी

सीबीआई, सवर्णों का आर्थिक आरक्षण और अध्योध्या विवाद- इन तीनों मसलों पर गौर करें तो हम किस नतीजे पर पहुंचेंगे? सरकार, संसद, सर्वोच्च न्यायपालिका और विपक्ष - सबकी इज्जत पैंदे में बैठी जा रही है। सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा को सर्वोच्च न्यायालय ने 77 दिन के बाद अचानक बहाल कर दिया लेकिन सरकार ने फिर उन्हें हटा दिया। 

सीबीआई के निदेशक को लगाने और हटानेवाली कमेटी के तीन सदस्य होते हैं। प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और संसद में विपक्ष का नेता ! मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने खुद कन्नी काट ली और अपनी जगह न्यायमूर्ति ए.के. सीकरी को भेज दिया। सीकरी ने मोदी की हां में हां मिलाई याने तीन में से दो लोगों ने कमाल कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने जिस वर्मा को बहाल किया था, उसे इन दोनों ने निकाल बाहर किया। विपक्षी नेता कांग्रेस के मल्लिकार्जुन खड़गे हाथ मलते रह गए। मैं पूछता हूं सीकरी ने अपनी ही अदालत की नाक क्यों काट ली? 

यदि वर्मा को हटाना ही था तो आपने उसे बहाल क्यों किया था? यदि केंद्रीय निगरानी आयोग (सीवीसी) की जांच के आधार पर वर्मा को हटाया गया तो मैं पूछता हूं कि अपना फैसला करते वक्त अदालत ने वह रपट नहीं देखी थी क्या? या तो अदालत गलत है या प्रधानमंत्री वाली कमेटी गलत है। इस कमेटी का क्या यह कर्तव्य नहीं था कि वह वर्मा को बुलाकर उनसे सीवीसी के आरोपों का जवाब मांगती? वर्मा को जिस फुर्ती से दो बार हटाया गया है, वह कांग्रेस के इन आरोपों को मजबूत बनाती है कि सरकार वर्मा से बुरी तरह डर गई है। उसे डर यह भी था कि वर्मा अगले 20 दिन में कहीं रफाल-सौदे की भी खाल न उधेड़ दे। 

वर्मा ने दुबारा अपने पद पर अपने ही उन 13 अफसरों को वापस बुला लिया, जिनका तबादला सरकार के इशारे पर अस्थायी निदेशक ने कर दिया था। वर्मा ने जबरदस्त हिम्मत दिखाई। आलोक वर्मा और उनके प्रतिद्वंदी राकेश अस्थाना, दोनों पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। वे सही सिद्ध भी हो सकते हैं, क्योंकि उनके मालिकों (नेताओं) के भ्रष्टाचार ने पूरी नौकरशाही को भ्रष्ट कर रखा है लेकिन यह कितना दुखद है कि हमारे देश की दोनों बड़ी पार्टियां अपने-अपने अफसर के बचाव में दीवानी हो रही हैं। कांग्रेस आलोक वर्मा और भाजपा राकेश आस्थाना को बचाने पर तुली हुई है। दोनों पार्टियां भ्रष्टाचार की दुश्मन नहीं, एक-दूसरे की दुश्मन लग रही हैं।

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