सीबीआई: अनाड़ीपन

तीन दिन पहले मैंने लिखा था कि केंद्रीय जांच ब्यूरो के दोनों झगड़ालू अफसरों- आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना-- को छुट्टी पर भेज दिया जाए और सारे मामले की निष्पक्ष जांच करवाई जाए। सरकार ने यह काम उसी रात कर दिखाया लेकिन जैसा कि वह प्रायः करती रहती है, इस मामले में भी उसने अपना अनाड़ीपन दिखा दिया। सीबीआई के मुखिया को लगाने और हटाने का अधिकार न तो प्रधानमंत्री को है, न गृहमंत्री को है और न ही केंद्रीय निगरानी आयोग को है। 

यह अधिकार कानून के मुताबिक उस कमेटी को है, जो प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और संसद में विपक्ष के नेता को मिलाकर बनती है। आलोक वर्मा, जो कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के मुखिया है, उन्हें इस कमेटी की राय के बिना ही छुट्टी पर भेज दिया गया है। अब वर्मा ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा दिया है। जाहिर है कि सरकार को वहां मुंह की खानी पड़ेगी, हालांकि सरकार कह सकती है कि वर्मा को हटाया नहीं गया है, सिर्फ छुट्टी पर भेजा गया है। 

इतना ही नहीं, सरकार ने न. 2 अफसर राकेश अस्थाना को भी छुट्टी पर भेज दिया है लेकिन उनकी जांच कर रहे दर्जन भर अफसरों का भी तबादला कर दिया है और उनकी जगह ऐसे अफसरों को नियुक्त कर दिया है, जिनकी निर्भयता और निष्पक्षता पर पहले ही प्रश्नचिन्ह लग चुके हैं। कुल मिलाकर सरकार ने मध्य-रात्रि में तत्काल कार्रवाई की और दोनों शीर्ष अफसरों के दफ्तरों को सील कर दिया, जो कि सराहनीय है लेकिन अस्थाना की जांच कर रहे एक वरिष्ठ अफसर को अंडमान-निकोबार तबादला कर दिया गया है। वहां किसी अफसर को भेजने का अर्थ क्या होता है, यह हमारे नेताओं को क्या पता नहीं है ? 

इसका अर्थ है, सजा। क्या इस अफसर को यह सजा इसलिए दी गई है कि वह गुजरात केडर के राकेश अस्थाना के भ्रष्टाचार के पुराने कारनामों को उजागर कर रहा था। ऐसा करने से नेताओं की बदनामी होगी, यह उन्हें पता है लेकिन इसके बावजूद इस रामभरोसे सरकार ने यह जिम्मेदारी अफसर भरोसे छोड़ दी है, ऐसा लगता है। कांग्रेसी नेता राहुल गांधी का कहना है कि आलोक वर्मा रेफल सौदे की जांच पर अड़े हुए थे, इसीलिए उनके खिलाफ यह कार्रवाई की गई है और सरकार गुजरात केडर के अस्थाना को बचाने में जुटी हुई है। यदि राहुल अपनी बात के लिए कुछ ठोस प्रमाण जुटा पाए तो सरकार के लिए संसद का यह शीतकालीन सत्र बहुत ज्यादा गर्मी पैदा कर देगा।

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