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वाह नायडू, हिंदी लाओ!

नायडू ने देश की सड़ती हुई रग पर उंगली रख दी है। उन्होंने कहा है कि हम लोग अंग्रेजी के मोह-पाश में फंसते चले जा रहे हैं। हमारी ‘भाषा’ के साथ-साथ हमारी ‘भावना’ भी बदलती जा रही है। हमें हमारी शिक्षा नीति पर फिर से विचार करने की जरुरत है। राष्ट्रभाषा के तौर पर हिंदी सभी को सीखनी चाहिए और समस्त राष्ट्रीय भाषाओं को भी समान रुप से प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। 

यही बात गांधी, लोहिया और गोलवलकर कहा करते थे लेकिन हमारे नेताओं की बौद्धिक गुलामी इतनी गहरी रही है कि उनकी हिम्मत नहीं कि वे अंग्रेजी के वर्चस्व को चुनौती दे। अपने आप को राष्ट्रवादी कहने वाले नेता सिर्फ एक ही रट लगाए रहते हैं, हिंदी लाओ, हिंदी लाओ। ये लोग हिंदी के सबसे बड़े दुश्मन हैं, क्योंकि हिंदी को खत्म करने वाली अंग्रेजी के खिलाफ वे एक शब्द भी नहीं बोलते। जब तक अंग्रेजी का दबदबा बना रहेगा, हिंदी का दम घुटता चला जाएगा। इसके अलावा हिंदी, हिंदी चिल्लाकर वे अन्य समस्त भारतीय भाषाओं को हिंदी का दुश्मन बना देते हैं। 

हिंदी को इस दोहरी दुश्मनी से बचाना हो तो ‘अंग्रेजी हटाओ और भारतीय भाषाएं लाओ’ - यही एक मात्र नारा है। अंग्रेजी हटाओ का अर्थ अंग्रेजी भाषा से नफरत करना नहीं है। उसके वर्चस्व का, उसके एकाधिकार का, उसकी अनिवार्यता का विरोध करना है। विदेशी भाषाओं का ज्ञान तो स्वागत योग्य है। मैंने जब अपनी पीएच.डी. का शोधग्रंथ (अंतरराष्ट्रीय राजनीति) हिंदी में लिखा तो रुसी, फारसी और जर्मन भी सीखी। किसी भाषा से कोई मूर्ख ही नफरत कर सकता है लेकिन उससे बड़ा मूर्ख कौन होगा, जो अपनी भाषा को नौकरानी और विदेशी भाषा को महारानी मान बैठे। 

भारत की संसद, अदालत और सरकारी कामकाज में अंग्रेजी को महारानी का दर्जा देनेवाले नेताओं और नौकरशाहों को आप क्या कहेंगे? हमारे इन भोले भंडारियों को यह पता नहीं कि अंग्रेजी हटेगी तो हिंदी समेत अन्य भाषाओं के लिए जगह अपने आप खाली हो जाएगी।

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