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श्रीलंका में श्रीसेन की दादागीरी

श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाल श्रीसेन की दादागीरी इस समय आसमान को छू रही है। पहले उन्होंने प्रधानमंत्री रनिल विक्रमसिंघ को अकारण ही बर्खास्त कर दिया और उनकी जगह अपने प्रतिद्वंदी और पूर्व राष्ट्रपति महिंद राजपक्ष को प्रधानमंत्री घोषित कर दिया। नए प्रधानमंत्री राजपक्ष को संसद में अपना बहुमत 14 नवंबर को सिद्ध करना था लेकिन 225 सदस्यों की संसद में वे मुश्किल से 106 सांसद ही जुटा पाए। उनका साम, दाम, दंड, भेद भी कुछ काम नहीं आया। 

ऐसी स्थिति में उन्होंने एक मनमानी और भी कर दी। संसद को ही भंग कर दिया। अब जनवरी 2019 में नई संसद के चुनाव होंगे। संसद को उसकी अवधि के 20 माह पहले भंग करके वे यह समझ रहे हैं कि राजपक्ष और वे मिलकर प्रचंड बहुमत बना लेंगे। उन्हें यह आशा इसलिए है कि अभी-अभी हुए स्थानीय निकायों के चुनावों में महिंद राजपक्ष को काफी जन-समर्थन मिला है। लेकिन अभी हुई इस दादागीरी का श्रीलंका के मतदाताओं पर क्या असर पड़ेगा, इसका अंदाज श्रीसेन और राजपक्ष को जरा भी नहीं है। 

यह ठीक है कि राजपक्ष ने राष्ट्रपति के रुप में श्रीलंका को तमिल आतंकवादियों से छुटकारा दिलवाया लेकिन उनके अपने मंत्री श्रीसेन ने उनके तानाशाही रवैए का विरोध किया और नई पार्टी खड़ी करके उन्हें कोने में सरका दिया। अब दोनों का दुबारा मेल हो गया है, क्योंकि दोनों चीनपरस्त हैं और दोनों भारत से दूरी बनाए रखना चाहते हैं। 

श्रीसेन ने गत माह आरोप लगाया था कि भारत की गुप्तचर सेवा उनकी हत्या करवाना चाह रही है। जबकि रनिल विक्रमसिंघ भारत के मित्र हैं और वे गत माह भारत आकर दोनों देशों के संबंध को घनिष्टतर बनाने की घोषणा कर गए हैं। यदि रनिल लोकप्रिय नहीं होते तो उनका साथ देने वाले कई पार्टियों के सांसद दल-बदल क्यों नहीं कर लेते? 

यो भी श्रीसेन के साढ़े तीन साल के शासन में श्रीलंकाई रुपए की कीमत बहुत गिर गई, रोजगार घट गया और 400 करोड़ रु. की महत्वपूर्ण आवास-योजना अधर में लटक गई। जनवरी 2019 में चुनाव होंगे, यह भी अभी पता नहीं, क्योंकि संविधान की धारा 70 (1) के मुताबिक राष्ट्रपति साढ़े चार साल के पहले संसद को भंग नहीं कर सकते। विरोधी दल अदालत के द्वार खटखटा रहे हैं। वे इसे लोकतंत्र की हत्या कह रहे हैं। अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय राष्ट्रों ने भी काफी चिंता जाहिर की है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत से सटे हुए छोटे-से देश में लोकतंत्र का गला घुट रहा है, यह हमारे लिए भी चिंता का विषय होना चाहिए।

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