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रेफल-सौदाः गले की चट्टान

सर्वोच्च न्यायालय ने रेफल-सौदे पर उंगली उठा दी है। उसने सरकार से यह पूछा है कि वह उसे सिर्फ यह बताए कि इन रेफल विमानों की खरीद का फैसला कैसे किया गया है? अदालत को इससे मतलब नहीं कि इन विमानों को तिगुना पैसा देकर क्यों खरीदा गया है और तकनीकी दृष्टि से ये कितने शक्तिशाली हैं?

अदालत का यह तर्क समझने में मुझे कुछ दिक्कत हो रही है। 500 करोड़ रु. का विमान 1600 करोड़ में खरीदा जाए और आपको इस लूट-पाट की चिंता नहीं है? कमाल है? यह पैसा किसका है ? इस देश की गरीब जनता का है। किसी नेता या जनरल के बाप का नहीं है। यदि किसी जज का नौकर 100 रु. किलो के अनार के 300 रु. दे आए तो क्या जज साहब उससे पूछेंगे भी नहीं?

माना कि रेफल विमान, अनार नहीं है। यदि उसकी कुछ खर्चीली और अतिरिक्त सामरिक विशेषताओं को सरकार गोपनीय रखना चाहती है तो जरुर रखे लेकिन उसे मोटे तौर पर जनता को यह बताना चाहिए कि वह इन 36 विमानों के 60 हजार करोड़ रु. क्यों दे रही है? यदि इसे वह छुपाएगी तो यह बोफोर्स से हजार गुना बड़ा भ्रष्टाचार बनकर उसके गले की चट्टान बन जाएगा।

वह सिर्फ 60 करोड़ का था। यह 60 हजार करोड़ का है। राजीव गांधी की चुप्पी उस भोले प्रधानमंत्री को ले डूबी लेकिन चतुर-चालाक मोदी की चुप्पी ने बेजान नेताओं की आवाज़ में जान डाल दी है। बोफोर्स के बंद मामले को फिर से अदालत में ले जाने और रक्षा मंत्री निर्मला सेतुरामन को इस वक्त पेरिस भेजने से इस सौदे में भ्रष्टाचार का शक बढ़ गया है। फ्रांसीसी अखबारों में पहले राष्ट्रपति ओलांद और अब दासाल्ट कंपनी के अधिकारियों के बयान छपे हैं, जो कहते हैं कि अनिल अंबानी की कंपनी को बिचौलिया बनाने का प्रस्ताव भारत सरकार का ही था।

अदालत को अब और कौनसा प्रमाण चाहिए? क्या प्रधानमंत्री मोदी या तत्कालीन रक्षा मंत्री पर्रिकर ने अंबानी का नाम लिखकर दासाल्ट कंपनी को दिया होगा? ऐसे घपले कलम से नहीं होते, मुंह से होते हैं। अदालत उनका मुंह कैसे पकड़ेगी ? अदालत शायद सरकार का कान पकड़ने की कोशिश कर रही है, वह भी सीधे नहीं, अपने हाथ को घुमा-फिराकर याने यदि अनिल अंबानी की दलाली की बात पकड़ा गई तो फिर यह सिद्ध करने की शायद जरुरत नहीं रहेगी कि 500 करोड़ के 1600 करोड़ क्यों हुए? लोग सारी बात अपने आप समझ जाएंगे।

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