महाराष्ट्र में शिवसेना अड़ी, भाजपा के लिए सरकार बनाना मुश्किल

ऋषिराज

मुंबई। महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के नतीजे 25 अक्टूबर को आने के बाद अब तक सरकार बनने की तस्वीर साफ नहीं है। हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजे संकेत दे रहे थे कि हरियाणा में मनोहरलाल खट्टर की सरकार गई और महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना की सरकार आसानी से बनेगी, लेकिन हरियाणा में भाजपा ने सरकार बना ली है, खट्टर दुबारा मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं, और महाराष्ट्र में देवेन्द्र फड़नवीस का इंतजार अभी तक जारी है। भाजपा ने पिछले पांच-छह साल जमकर दबाव वाली राजनीति की है। शिवसेना को पहली बार भाजपा नेताओं को दबाव में लाने का मौका मिला है। अमित शाह को अपना महाराष्ट्र दौरा टालना पड़ा है। महाराष्ट्र में अब यह स्थिति बन गई है कि शिवसेना किंगमेकर की भूमिका में है। उसने शर्तें रख दी हैं, जो भाजपा मंजूर नहीं कर रही है। कांग्रेस के नेता हाईकमान से निर्देश लेने दिल्ली पहुंच गए हैं। इससे एक बड़े राजनीतिक उलट-फेर के आसार दिखाई देने लगे हैं।

बहरहाल गुरुवार शाम तक स्थिति यह थी कि शिवसेना विधायक दल की बैठक में एकनाथ शिंदे को विधायक दल नेता चुना गया। सरकार बनाने के मुद्दे पर शिवसेना ने पत्ते नहीं खोले। देवेन्द्र फड़नवीस का दावा बरकरार है कि वह मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे और सरकार अगले पांच साल तक चलेगी। शिवसेना का रुख देखकर राकांपा और कांग्रेस भी भाजपा को विपक्ष में बैठाने की रणनीति पर विचार करने लगी हैं। महाराष्ट्र की कुल 288 विधानसभा सीटों पर चुनाव हुए, जिसमें से भाजपा को 105, शिवसेना को 56, राकांपा को 54, कांग्रेस को 44 और मनसे को एक सीट मिली है। इसके अलावा 13 निर्दलीय उम्मीदवार जीते हैं। ओवैसी की एआईएमआईएम पार्टी को दो, बहुजन विकास अघाड़ी को तीन, माकपा को एक, जन सुराज्य शक्ति को एक, क्रांतिकारी शेतकरी पार्टी को एक, पीजेंट्स एंड वर्कर्स पार्टी ऑफ इंडिया को एक और प्रहर जनशक्ती पक्ष को दो सीटें मिली हैं। सरकार बनाने के लिए विधानसभा में 145 विधायकों का समर्थन चाहिए, जो अकेले भाजपा के पास नहीं है।

भाजपा विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी अवश्य है, जिसके 105 विधायक हैं। अगर सभी 13 निर्दलीय और अन्य पार्टियों के 11 विधायक भी उसे समर्थन दे दें तो उसे छह विधायक कम पड़ेंगे। राजनीतिक पार्टियों में जितनी तोड़-फोड़ होनी थी, वह विधानसभा चुनाव के पहले हो चुकी है, इसलिए राकांपा और कांग्रेस के विधायकों के भाजपा के समर्थन में जाने की संभावना कम है। महाराष्ट्र में शिवसेना अब तेल देखो, तेल की धार देखो की नीति पर चल रही है। किंगमेकर की भूमिका में होने से उसके विधायकों की बाड़ाबंदी की संभावना भी बहुत कम है। राकांपा अब शरद पवार के कुशल हाथों में है, कोई भी विधायक उनके हाथ से नहीं निकलेगा। कांग्रेस के विधायक भी ऐसा नहीं करेंगे।

इस परिस्थिति में संभावना बन रही है कि महाराष्ट्र में राकांपा और कांग्रेस के समर्थन से शिवसेना की सरकार बन सकती है। इसमें राकांपा सरकार में शामिल हो सकती है और कांग्रेस बाहर से समर्थन दे सकती है। यही कारण है कि अब तक महाराष्ट्र में नई सरकार की तस्वीर साफ नहीं हो पा रही है। सूत्रों के मुताबिक शिवसेना उप मुख्यमंत्री पद के साथ ही गृह, राजस्व, शहरी विकास, जैसे कई महत्वपूर्ण विभाग चाहती है, जिसके लिए भाजपा तैयार नहीं है। महाराष्ट्र के मामला इतना जटिल हो जाने के बावजूद बड़े नेताओं के बयान सामने नहीं आ रहे हैं।

शिवसेना ने यह साबित कर दिया है कि महाराष्ट्र की राजनीति में उसे सिर्फ पिछलग्गू सहयोगी के रूप में नहीं बने रहना है। उसकी अपनी भी हैसियत है। पिछला विधानसभा चुनाव भाजपा-शिवसेना ने अलग-अलग लड़ा था। भाजपा मोदी लहर में बहुमत पा गई, लेकिन उसने चुनाव बाद शिवसेना से गठबंधन बहाल किया। इस बार भाजपा-शिवसेना ने तालमेल करते हुए चुनाव लड़ा है, लेकिन नतीजे आने के बाद शिवसेना उत्साह में है। अब वह चुनाव से पहले का गठबंधन तोड़ने की मुद्रा में आ गई है।

बताया जाता है कि शुक्रवार को महाराष्ट्र के बारे में कांग्रेस हाईकमान कोई फैसला करेगा। हाईकमान की हरी झंडी मिलते ही महाराष्ट्र में बिसात बदल जाएगी। राकांपा ने विपक्ष में बैठने की घोषणा अवश्य की है, लेकिन राजनीति की चाल कुछ अलग होती है। शरद पवार महाराष्ट्र के हित में शिवसेना का समर्थन कर सकते हैं। कांग्रेस को भी अपने साथ ला सकते हैं। एक दूर की संभावना यह भी है कि भाजपा शिवसेना विधायकों को तोड़कर उनके समर्थन की जुगाड़ कर सकती है, लेकिन यह मुश्किल है। फिलहाल कोई भी राजनीतिक पंडित यह दावा करने की स्थिति में नहीं है कि महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार बनेगी या नहीं बनेगी।

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