मंजिल की तलाश में ये होनहार - Naya India
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मंजिल की तलाश में ये होनहार

निचले स्तर से उठ कर विश्व क्रिकेट में हालांकि कुछेक खिलाड़ियों ने धमक जमाई है लेकिन छोटी उम्र में अपनी प्रतिभा की झलक दिखाने वाले कुछ ऐसे खिलाड़ी भी हैं जो सही मंजिल की तलाश में है। तीन साल पहले विश्व क्रिकेट इतिहास में पहली बार एक हजार रन से ज्यादा की पारी खेल कर प्रणव धनावड़े अपने पिता प्रशांत के ऑटो रिक्शा में बैठकर मुंबई के उपनगर कल्याण की रामबाग चॉल के अपने घर चले गए। एक ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए यकायक सुर्खियों में आ गए प्रणव की दिनचर्या उसके बाद सामान्य हो गई है। मीडिया का फोक्स खत्म हो गया है। शुरुआती उत्साह में प्रणव और उनके माता-पिता ने खूब इंटरव्यू दिए। अब कहने को कुछ नहीं रह गया है और उन्हें सुनने में भी किसी की रूचि नहीं रह गई है। 396 मिनट में 327 गेंदों पर 129 चौकों व 59 छक्कों की मदद से 312.38 के स्ट्राइक रेट को बनाए रखते हुए 1009 रन बना कर जब प्रणव मैदान से निकले थे, स्टार बन चुके थे। हर कोई उनसे मिलना चाहता था। हर चैनल उनसे एक्सक्लूजिव इंटरव्यू पाने की होड़ में था। थके हारे प्रणव को पानी पीने या चैन से बैठने का मौका तक नहीं मिला।

वे गुजारिश करते रहे कि मीडिया वाले एक साथ उनसे सवाल पूछे लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था। एक पारी ने उनकी जिंदगी जो बदल दी थी। लेकिन अब प्रणव अब इस मंथन में है कि उसका भविष्य क्या होगा? सपना सचिन तेंदुलकर और आस्ट्रेलिया के ब्रेड हैडिन जैसा बनने का है। इसे पूरा करना कोई आसान चुनौती नहीं है। महाराष्ट्र सरकार ने प्रणव की पढ़ाई और कोचिंग का सारा खर्च उठाने का एलान जरूर किया लेकिन प्रणव का क्रिकेटीय सफर अटका हुआ है।

अपने जीवन का दूसरा शतक बनाते हुए प्रणव ने तो पैरों की मांसपेशियों में खिंचाव के बावजूद बिना आउट हुए 1009 रन की जो अतुलनीय पारी खेली उसने तो कई नए विश्व रिकार्ड गढ़ दिए। उनसे पहले एक पारी का सर्वोच्च व्यक्तिगत स्कोर 628 रन था जो 1899 में ब्रिटिश लीग में क्लार्क हाउस के एजे कोलिंस ने नार्थ टाउन हाउस के खिलाफ बनाए थे। मुंबई क्रिकेट संघ से मान्यता प्राप्त अंडर-16 एच टी भंडारी चैलेंज ट्राफी इंटर स्कूल क्रिकेट टूर्नामेंट में केसी गांधी इंगलिश स्कूलऔर आर्य गुरुकुल के बीच हुए मैच ने अगर अपनी तरफ से एक नया इतिहास रच दिया तो सिर्फ प्रणव की ही वजह से नहीं।

पहले खेलते हुए आर्य गुरुकुल की टीम 31 रन ही बना पाई। दूसरी पारी में आयुष कामथ ने हैट्रिक समेत 16 रन पर आठ विकेट लेकर विरोधी टीम को 14.5 ओवर में 72 रन पर समेट दिया। केसी गांधी स्कूल की94 ओवर की 3 विकेट पर 1465 रन की विशालकाय पारी अगर प्रणव को समर्पित हो पाई तो आकाश सिंह व सिद्धेश पाटील की वजह से। आकाश ने पहले विकेट के लिए प्रणव के साथ 546 रन बनाए। दूसरे विकेट के लिए सिद्धेश व प्रणव ने 530 रन जोड़े। एक ही पारी में पांच सौ से ज्यादा रन की दो साझेदारियों का विश्व रिकार्ड, उस पर एक पारी और 1362 रन से जीत का विश्व रिकार्ड सबने मिला कर प्रणव की उपलब्धि को और चमकदार कर दिया।

खेलते समय बैट में आई दरार और पैरों की मांसपेशियों में खिंचाव के बावजूद प्रणव का दुनिया का पहला हजारी बल्लेबाज बनना निश्चित रूप से एक बहुत बड़ी उपलब्धि रही।

सवाल यह है कि प्रणव का आगे का सफर क्या दिशा लेगा? एक यादगार पारी के बाद अक्सर खिलाड़ियों का करिअर डांवाडोल होता रहा है। 1934 में 515 रन बनाने वाले डीआर हवेवाला हों या 1985-86 में 422 रन की पारी खेलने वाले छात्र संजीव जाधव, दोनों की प्रगति अचानक थम गई। संजीव जाधव की पारी जरूरी स्कूली क्रिकेट में एक चुनौती बनी और उसे पार करना सभी का लक्ष्य रहा। यह लक्ष्य कई बार पार हुआ है और अब वह प्रणव की मुट्ठी में है और क्रिकेटर बनने का सपना देखने वाले स्कूली बच्चों के लिए एक चुनौती।

अब चाहिए सही दिशा
इसमें कोई संदेह नहीं है अपनी लगन, मेहनत और प्रतिभा से प्रणव कई और पड़ाव तय कर सकते हैं। सचिन तेंदुलकर ने यह करके दिखाया भी। लेकिन यह जरूरी है कि जिस तरह की अनुकूल स्थितियां सचिन को मिली वह उन्हें भी मिले। अफसोस यह है कि ये स्थितियां किसी व्यवस्था के तहत नहीं बनी, संयोग से तैयार हो गईं। सचिन अलग ही मिट्टी के बने थे और उन्होंने छोटे-छोटे मौके का बड़ा फायदा उठा लिया। लेकिन सचिन जैसा डीएनए हर खिलाड़ी का नहीं हो सकता। प्रतिभा की झलक दिखाने वाले खिलाड़ी को आगे बढ़ने के लिए अतिरिक्त प्रोत्साहन और विशेष देख-रेख चाहिए ताकि वह अपने लक्ष्य से भटक न सके। सचिन और प्रणव के बीच की कड़ी में भी कुछ ऐसे खिलाड़ी हुए हैं जिन्होंने स्कूली क्रिकेट में चमत्कार दिखाया लेकिन उनकी चमक ठीक से विकसित नहीं हो पाई।

छह साल पहले चौदह बरस के पृथ्वी शॉ ने 546 रन की व्यक्तिगत पारी खेली। निश्चित रूप से यह पृथ्वी की बड़ी निजी उपलब्धि थी लेकिन यह अप्रत्याशित और चमत्कृत कर देने वाली कतई नहीं थी। छोटी उम्र के क्रिकेटरों में रनों के पहाड़ खड़ा करने का लगन को उन्होंने विस्तार दिया था। बड़ा स्कोर करने की शुरुआत सबसे पहले संजीव जाधव ने की थी। सरफराज खान ने 2009 में हैरिस शील्ड में 439 रन बना कर टूर्नामेंट का करीब 46 साल का रिकार्ड तोड़ दिया। बिना आउट हुए 427 रन बनाने का पिछला रिकार्ड आर नागदेव का था जो उन्होंने 1963-64 में बनाया था। 2013 में 473 रन बना कर अरमान जाफर ने सरफराज का रिकार्ड तोड़ दिया। पूर्व टैस्ट खिलाड़ी वसीम जाफर के भतीजे अरमान ने। 2010 में उन्होंने चौदह साल तक के खिलाड़ियों के जाइल्स शील्ड टूर्नामेंट में 498 रन बनाए थे।

रनों की अमिट भूख रखने वाले चारों ही चमत्कारिक खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर को अपना प्रेरणा स्रोत मानते हैं। हालांकि चारों व्यक्तिगत स्कोर में सचिन को पीछे छोड़ चुके हैं। चारों के सफर में समानता रही है। एक जैसी पृष्ठभूमि और कुछ नया कर दिखाने की एक सी लगन। पृथ्वी शॉ पर लोगों की निगाह उसी समय गढ़नी शुरू हो गई थी जब वह 2008 में समय पर मैदान में पहुंचने के लिए सुबह छह बजकर नौ मिनट की विरार से चर्चगेट जाने वाली फास्ट लोकल ट्रेन पकड़ता था। इसके लिए उसे रोज तड़के साढ़े चार बजे उठना पड़ता था। इसमें वह जरा भी ढील नहीं देता था। ट्रेन छूटने का मतलब था प्रैक्टिस के लिए बांद्रा के एमआईजी मैदान में समय पर नहीं पहुंच पाना।

पृथ्वी जब चार साल का था, उसकी मां का निधन हो गया। रेडीमेड कपड़ों की दुकान चलाने वाले उनके पिता पंकज का कहना है कि पृथ्वी में बचपन से ही अद्भुत प्रतिभा थी और म्युनिसपेलिटी मैदान में जब वह अपने से कहीं बड़ी उम्र के गेंदबाजों की धुनाई करता था तो लोगों की भीड़ जमा हो जाती थी। पंकज शुरू से ही पृथ्वी के प्रशिक्षक, संरक्षक और प्रेरक रहे। पंकज की भी क्रिकेटर बनने की इच्छा थी लेकिन जब उनका सपना पूरा नहीं हो पाया तो उन्होंने बेटे के शौक व लगाव को नए आयाम देना शुरू कर दिया। रोजाना प्रैक्टिस के लिए जाना आसान नहीं था। पृथ्वी के साथ पिता रोज 66 किलोमीटर का सफर तय कर बांद्रा के मैदान पहुंचते उसे अभ्यास करते देखते और फिर वापस घर लाते। पृथ्वी जब भी शतक बनाता, पिता उसे चाइनीज खाना खिलाने ले जाते। यह परंपरा बन गया था।

इस बीच पंकज अपनी दुकान पर पूरा ध्यान नहीं दे पाए। लेकिन इसका उन्हें कभी अफसोस नहीं रहा। पृथ्वी लगातार सफलता की सीढ़ियां जो चढ़ रहा था। पूर्व टैस्ट क्रिकेटर नीलेश कुलकर्णी की कंपनी के एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत पृथ्वी को पिछले दिनों मैनचेस्टर (इंग्लैंड) में खेलने का मौका मिला तो वहां भी सर्द हवाओं के बीच अपने पहले ही मैच में डिवीजन ‘ए’ की टीम चेडली हम स्कूल के खिलाफ उसने शतक बना दिया। 85 चौकों और पांच छक्कों की मदद से 546 रन की पारी खेलने से पहले पृथ्वी का सर्वश्रेष्ठ स्कोर 225 रन था। इसमें उसने थोड़ा बहुत नहीं बल्कि 321 रन का सुधार किया। पृथ्वी को अफसोस इस बात का रहा कि 1988 में बने सचिन व कांबली की साझेदारी के 664 रन के रिकार्ड को वह नहीं तोड़ पाया। सत्यलश जैन के साथ वह दूसरे विकेट के लिए 619 रन ही जुटा सका। बहरहाल, पृथ्वी का सफर रणजी ट्राफी, दिलीप ट्राफी से होता हुआ टैस्ट क्रिकेट तक पहुंच चुका है लेकिन बाकी अभी मजबूत जमीन तलाश रहे हैं। पृथ्वी ने सरफराज खान और इमरान जाफर का रिकार्ड भले ही तोड़ा लेकिन दोनों का बल्ला भी लगातार रंग दिखाता रहा है। पृथ्वी के पिता की तरह दोनों के पिता ने उनके कोच की भूमिका निभाई और यह ध्यान रखा कि करिअर में आगे बढ़ने के लिए उनके बेटों के सामने कोई बाधा खड़ा न हो। स्कूली क्रिकेट में धमाल मचाने के बाद सरफराज खान 19 साल से कम के खिलाड़ियों की प्रतियोगिता में मुंबई और भारत की तरफ से खेले। 2013 में चार देशों की अंडर-19 प्रतियोगिता में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ विशाखापत्तनम में 66 गेंदों में 101 रन उन्होंने बनाए। उसी साल मुंबई की तरफ से खेलते हुए उत्तर प्रदेश के खिलाफ भी सरफराज ने शतक जमाया। सरफराज की सफलता में उसके पिता नौशाद खान का खासा योगदान है।

वे उसे समझाते रहते हैं कि एक मंजिल छू लेना ही संतुष्ट होने का कारण नहीं बनना चाहिए। सरफराज उस समय चर्चा में आया था जब हैरिस शील्ड में 439 रन बना कर उसने सचिन तेंदुलकर का रिकार्ड तोड़ा था। अगस्त 2013 में सरफराज अंडर-19 टीम के साथ श्रीलंका गया और वहां एक मैच में 27 रन पर चार विकेट लेकर उसने अपनी गेंदबाजी का हुनर भी दिखाया। जिंबाब्वे के खिलाफ मैच में उसने अर्धशतक जमाया। सरफराज को अभ्यास में कोई दिक्कत न हो, इसके लिए उसके पिता नौशाद ने अपने घर के पास छोटा एस्ट्रो टर्फ लगाया है। रोज सरफराज अपने छोटे भाई मुशीद के साथ इस पर अभ्यास करता है। क्रिकेट पर ध्यान देने की वजह से सरफराज की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसके लिए स्टार ट्यूटोरियल्स के हितेश दोषी उन्हें निजी तौर पर मुफ्त पढ़ाते हैं। विराट कोहली की वजह से सरफराज को आईपीएल की बंगलूर टीम में जगह तो मिल गई लेकिन वे टीम का अनिवार्य हिस्सा नहीं बन पाए।

पूर्व टैस्ट खिलाड़ी वसीम जाफर से प्रेरणा पा कर क्रिकेट खेलने का सपना पालने वाले अरमान जाफर ने 2012 में हैरिस शील्ड व जाइल्स शील्ड जैसी स्कूली प्रतियोगिताओं में 2670 रन बनाए। इसमें हैरिस शील्ड में बनाया गया 498 रन का स्कोर भी शामिल है। उसके बाद मुंबई की अंडर-14 टीम के लिए अरमान ने 120, 115 व 90रन की पारियां खेली। पहली दो पारियों में तो वह नाट आउट रहा। अरमान की ख्याति रन मशीन की बनी। हैरिस शील्ड में 473 व 498 रन की पारियां खेल कर उसने इसे पुख्ता भी किया। अरमान के पिता कलीम जाफर ने पहले अपने छोटे भाई वसीम जाफर का करिअर संवारने में दिन रात एक कर दिया। अब उनका सपना अरमान को बुलंदी पर पहुंचाने का है। लेकिन उनकी अपनी सीमा है।

प्रणव की कहानी भी अलग नहीं है। पिता प्रशांत ऑटो चलाते हुए कमेंट्री सुनते थे और घर में होते तो टीवी पर मैच देखते थे। प्रणव ने ऐसे माहौल में आखें खोली। प्रणव जब पांच साल का हुआ पिता उसके लिए प्लास्टिक की बैट बॉल ले आए। दस साल की उम्र में प्रणव को ट्रेनिंग की सुविधा मिल गई। और खिलाड़ियों की तरह बेहतर खान पान, अच्छी किट प्रणव को कभी नहीं मिल पाई लेकिन घर के हालात को देखते हुए उसने कभी किसी चीज के लिए जिद नहीं की। उस संतोष का प्रणव को अच्छा फल मिला भी।

प्रणव और उससे पहले सरफराज, अरमान व पृथ्वी ने साबित कर दिया कि उनमें लगन और नैसर्गिक प्रतिभा है। पृथ्वी शॉ को तो पड़ाव मिल गया। बाकी तीन खिलाड़ियों के लिए आगे का सफर मुश्किल होता जा रहा है। इस मोड़ पर बीसीसीआई के सक्रिय होने की जरूरत है। जूनियर स्तर पर चमकने वाले खिलाड़ियों को निखारने के लिए उसे ठोस रणनीति अपनानी चाहिए। ऐसे खिलाड़ियों के प्रशिक्षण पर उसे विशेष ध्यान देना चाहिए ताकि एकाग्रचित्त होकर अपने खेल कर ध्यान दे सके। आगे के मुश्किल भरे रास्ते में प्रोत्साहन का सहारा नहीं मिला तो कुदरती प्रतिभाओं को कुम्हलाते देर नहीं लगेगी।

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