भ्रामक प्रचार पर अंकुश कैसे लगे!

उपयुक्त कानून न होने की वजह से दशकों तक मैगी खाद्य सुरक्षा मानकों को ठेंगा दिखाते हुए हस्तियों की विज्ञापनी वाहवाही के सहारे भारतीय बाजार में बिकती रही। हल्ला मचने के बाद कुछ महीने का उस पर प्रतिबंध लगा और वह हट भी गया। विकसित देशों में ऐसा नहीं होता। मैगी की नौ किस्में बनाने वाली स्विटजरलैंड की कंपनी नेस्ले कई दशक पहले धुंआधार प्रचार के जरिए बच्चों के लिए स्वास्थ्य के कथित रूप से बेहतर विकल्प के तौर पर विकासशील देशों के बाजारों में दूध उतारा था। 1976 में हुए कानूनी विवाद में हालांकि कंपनी जीत गई लेकिन अमेरिका, कनाड़ा, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और यूरोप के देशों में नेस्ले के शिशु दूध पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। और आम सहमति से एक आचार संहिता बनी जिसे नेस्ले ने 1984 में स्वीकार कर अपने दूध में गुणात्मक सुधार किया। 2013 में ब्रिटेन में दुनिया की सबसे बड़ी बर्गर कंपनी ‘बर्गर किंग’ की गौमांस सप्लाई करने वाली सबसे बड़ी फर्म से लिए गए नमूनों की जांच से खुलासा हुआ कि गौमांस में घोड़े का मांस मिलाया गया था।
तत्काल उस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। 2001 में पेप्सी को के स्वामित्व में आने से पहले क्वेकर ओट्स नाम के अमेरिकी परिसंघ ने मानसिक रूप से विकलांग बच्चों को रेडियोधर्मी ओट मील खिला कर उसके उन पर असर का अध्ययन किया। प्रचार के जरिए अभिभावकों को आश्वस्त किया गया कि उनके बच्चों को उच्च पौष्टिकता वाला आहार ‘एमआईटी’ लेना चाहिए। पोल खुलने के बाद कंपनी को 18 करोड़ पचास लाख डालर का जुर्माना भरना पड़ा। 2001 में शाकाहारी लोगों और कुछ हिंदू संगठनों ने फास्ट फूड की दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी मैकडोनाल्ड पर मुकदमा कर उसे यह स्वीकार करने और माफी मांगने पर बाध्य कर दिया कि उसने फ्रेंच फ्राइ में गौमांस मिलाया था। 2010 में केलॉग्स के कई उत्पादों में स्वास्थ्य के लिए खतरनाक तत्व पाए गए। और इस ‘अपराध’ की सजा के लिए उसे भारी जुर्माना चुकाना पड़ा।
भारत में देर से ही सही भ्रामक विज्ञापन रोकने और उत्पादों की गुणवत्ता का मानक तय करने के लिए कई कानून बनाने की पहल हुई है। रियल एस्टेट कानून संसद में पास हो चुका है। इसमें व्यवस्था है कि खरीदार को अगर कोई बिल्डर निर्धारित समय पर विज्ञापन या प्रचार पुस्तिका में दिए गए मानकों व दावों के अनुरूप फ्लैट मुहैया नहीं करा पाता है तो उसे खरीदार की पूरी रकम ब्याज समेत लौटानी होगी। ऐसा न करने पर सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान है। संसद में उपभोक्ता संरक्षण कानून में संशोधन पर विचार होना है। एक संसदीय समिति ने सिफारिश की है कि इस कानून में संशोधन कर भ्रामक और गुमराह करने वाले विज्ञापनों के लिए पांच साल की सजा और पचास लाख रुपए के जुर्माने की व्यवस्था की जाए। इसके दायरे में उत्पाद के निर्माता, प्रमोटर और उसे एनडोर्स करने वाले को भी रखा जाए। अभी इस पर अंतिम फैसला नहीं हो पाया है।
बहस अब इस बात पर छिड़ गई है अगर किसी उत्पाद में गड़बड़ी पाई जाए तो उसके लिए सिर्फ कंपनी के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए या उसे एनडोर्स करने वाले सेलिब्रिटी के खिलाफ भी? दलील यह दी जा रही है कि किसी उत्पाद के गुण दोष को सेलिब्रिटी परख नहीं सकते। एनडोर्स कराने वाली कंपनियों के दावे पर वे भरोसा करते हैं।दुनिया भर में सेलिब्रिटी विभिन्न उत्पादों को एनडोर्स करते हैं। कई देशों में अनुबंध की शर्तें काफी व्यापक होती है और उसमें इस बात का पूरा प्रावधान किया जाता है कि सेलिब्रिटी पर कोई आंच न आए। सेलिब्रिटी की लोकप्रियता और लोगों में उसकी स्वीकार्यता अनुबंध का आधार होती है। इसमें रत्तीभर भी कमी आने पर कंपनियां हाथ खींच लेती हैं। विश्व विख्यात गोल्फर टाइगर वुड के विवादों में घिरने के बाद ऐसा ही हुआ। अनुबंध में सेलिब्रिटी को यह सुविधा दी जाती है कि अगर उत्पाद में कोई कमी पाई जाए तो वे अनुबंध तोड़ सकते हैं।
भारत में ऐसी कोई मिसाल नहीं है। भारत में सेलिब्रिटी के एनडोर्समेंट को निजी एजेंसियां संभालती हैं। उनका दावा है कि अनुबंध में वे कंपनी से यह स्पष्ट करा लेती हैं कि उत्पाद सुरक्षित है और भारतीय कानूनों के तहत सुरक्षा मानकों का पूरी तरह पालन किया गया है। इन एजेंसियों की दलील है कि अगर किसी उत्पाद में कोई कमी मिलती है तो उसके लिए उपभोक्ताओं की तरह सेलिब्रिटी को भी पीड़ित की श्रेणी में रखा जाना चाहिए?और सेलिब्रिटी को भरमाने वाली बातें कहने को दोष से मुक्त कर दिया जाना चाहिए। विज्ञापन फिल्में बनाने वाले प्रह्लाद कक्कड़ का कहना है कि उत्पाद बनाने वाला ही जिम्मेदार माना जाना चाहिए। जहां तक सेलिब्रिटी के एनडोर्समेंट की व्यवस्था करने वाली एजेंसियों का सवाल है तो उनमें भी समय-समय पर घपला होता रहा है। डेढ़ दशक पहले सचिन तेंदुलकर, ऋतिक रोशन, शाहरुख खान के एनडोर्समेंट पर 20 करोड़ रुपए लगाने वाली फर्म ‘होम ट्रेड’ बीस सहकारी बैकों को कथित रूप से चूना लगा कर बंद हो गई। भ्रामक प्रचार के लिए सेलिब्रिटी को कटघरे में खड़ा करने की एक पहल 2012 में हुई। लोगों को ठगने वाली रियल एस्टेट कंपनी का प्रचार करने वाली अभिनेत्री जेनेलिया डिसूजा के खिलाफ हैदराबाद हाई कोर्ट ने पुलिस से मामला दर्ज करने को कहा। जून 2015 में मैगी विवाद में अमिताभ बच्चन, माधुर दीक्षित व प्रीति जिंटा के खिलाफ एफआईआर हुई। निवेशकों को चूना लगाने वाली पर्ल इन्फ्रास्ट्रक्चर को एनडोर्स करने वाले आस्ट्रेलिया के पूर्व क्रिकेटर ब्रेट ली निशाने पर आए। लेकिन इन मामलों में कुछ हुआ नहीं।
उपभोक्ता संरक्षण कानून में संशोधन के बाद नया रास्ता खुल सकता है। कुछ एजेंसिया सेलिब्रिटी को इसके दायरे में लाने के खिलाफ हैं तो कुछ सेलिब्रिटी से नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करने का आग्रह भी कर रही हैं। अभिनेत्री रवीना टंडन का कहना है कि फिल्मी सितारों को गुटखे या शराब का विज्ञापन करने से खुद बचना चाहिए। उनके दोष उन्हें पता है। पिछले दिनों मुहिम चली थी कि फिल्मी सितारों की पत्नियों से अनुरोध किया जाएगा कि वे अपने पतियों को गुटखा व शराब का विज्ञापन करने से रोकें। इसका कोई असर नहीं हुआ है। अजय देवगन पहले पान मसाला का विज्ञापन करते थे अब उसी कंपनी की इलायची बेच रहे हैं। गिलास, म्यूजिक एलबम या पानी के नाम पर शराब के छद्म विज्ञापनों में फिल्मी सितारे बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं। जाहिर है कि वे यह अनजाने में नहीं कर रहे।
चार हफ्ते में गोरा करने का दावा करने वाली फेयर एंड लवली क्रीम का शाहरुख खान ने खूब विज्ञापन किया। दावा गलत साबित होने की शिकायत मिलने पर उपभोक्ता अदालत ने कंपनी पर 15 लाख रुपए का जुर्माना लगाया। शाहरुख लेकिन बच गए। अक्सर उत्पादों को एनडोर्स करने वाले सितारे जिस तरह उत्पाद का गुणान करते हैं उससे संदेश जाता है कि जो उनकी बात माने वह समझदार, जो नहीं माने वह बेचारा अज्ञानी। सेलिब्रिटी किसी उत्पाद को समाज सेवा के काम के रूप में एनडोर्स नहीं करते। उसके लिए उन्हें मोटी रकम मिलती है। इसमें कोई अनुचित या अनैतिक बात नहीं है। अपना उत्पाद बेचने वाली कंपनी सेलिब्रिटी की साख के हिसाब से उन्हें पैसा देती है। साख आसानी से नहीं बनती। लेकिन उस साख से लोग विज्ञापन में किए गए सेलिब्रिटी के दावे पर आंख मूंद कर भरोसा करते हैं। तो साख के टूटने का बोझ वे भी उठाएं।

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