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राजस्थान में प्रकृति ने दिखाई अपनी ताकत

ऋषिराज
इधर पूरा देश कोरोना वायरस से बचने के तरीके खोज रहा था, उधर राजस्थान में धीरे से घनी काली घटाओं ने आसमान को घेर लिया। 2 बजे से ही आसमान से सूचना मिल रही थी कि कुछ अप्रत्याशित होने वाला है, लेकिन आजकल ज्यादातर लोग मोबाइल से सूचनाएं ग्रहण करते हैं और मोबाइल की स्क्रीन देखते रहते हैं।

आसपास के वातावरण, धरती, हवा, पानी आदि की तरफ ध्यान देने का सिलसिला बहुत ही कम हो गया है। मनुष्य जितना अपने में मगरूर रह सकता है, उसे उतना मगरूर करने के वैज्ञानिक प्रयास सदियों से चले आ रहे हैं।

लोग सृष्टि की तरफ ध्यान न दें और वही करते रहें, जो उन्हें परंपरागत रूप से सिखाया गया है, या नए तरीकों से सिखाया जा रहा है। बड़ी बड़ी ताकतें मनुष्य को इस स्थिति में बनाए रखने के प्रयास में जुटी रहती हैं।

तो वह गुरुवार 5 मार्च 2020 की तारीख थी, जब सुबह सूरज रोज की तरह चमका था। धूप खिली थी। थोड़ी ठंडक थी। बंगलों के लान शानदार हरे-भरे थे। उनमें फूल खिलखिला रहे थे। खेतों में गेहूं, सरसों की फसलें लहलहा रही थी। सब्जियों की फसलें खुशहाली की सूचना दे रही थी। लोग चर्चा कर रहे थे कि इस बार फसल अच्छी हुई है।

किसानों में खुशहाली फैलेगी। यह उसी तरह की चर्चा थी, जैसी वर्ष 2014 से पहले लोग किया करते थे कि मोदी को नेता बना देंगे तो देश की हालत सुधर जाएगी। वैसे ही इस साल फसल बहुत अच्छी हुई थी और इस बार होली शानदार मनेगी, इसकी सूचना दे रही थी। लेकिन ऐसे ही उम्मीदें पूरी होने लगें तो फिर प्रकृति की ताकत कैसे समझ में आ सकती है। लोगों ने प्रकृति का सम्मान करना बहुत कम कर दिया है, इसलिए प्रकृति भी अपनी शक्ति अप्रत्याशित रूप से दिखाती है और लोग समझ नहीं पाते।

तो गुरुवार को भी ऐसा ही हुआ। शानदार सुबह रही, रोमांटिक दोपहर रही और दोपहर ढलते ही प्रलय का वातावरण उपस्थित हो गया। लोगों को समझ में नहीं आया कि यह क्या हो गया। जो जहां था, वह करीब एक घंटे से ज्यादा वहीं ठिठका रहा। मूसलाधार बारिश हो रही थी। ओले गिर रहे थे। तड़ातड़ तड़ातड़ की आवाज चारों ओर गूंज रही थी। सड़कों पर, मैदानों में, खेतों में लोग ओले गिरते हुए और उन्हें मोतियों की तरह जमीन पर बिखरते नाचते हुए देख रहे थे। जिसने भी यह दृश्य देखा, उसके लिए यह यादगार पल बन गया। यह क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है, कोई समझ नहीं पा रहा था। अच्छा भला दिन था। अच्छे से जिंदगी चल रही थी। ये ओले कहां से आ गए?

कई विचार मन में आते हैं। ईश्वर के प्रति श्रद्धा रखने के कारण यह भी दिमाग में आता है कि यह सब ईश्वर का किया धरा है। हो सकता है ईश्वर का कोई दरबार हो, जिसमें देवता बैठते हों और दरबार में कोरोना वायरस की चर्चा हो रही हो। भाषण दिए जा रहे हों कि हमारे प्रति श्रद्धा रखने वाले भक्त मनुष्यों का जीवन संकट में डालने के लिए एक कोरोना नाम दैत्य प्रकट हुआ है और जनता के दुख दूर करने वाली सरकारें सारे काम छोड़कर कोरोना से बचने के उपाय करने लगी हैं। इस पर गंभीर विचार हुआ होगा और इंद्र ने कोरोना को नष्ट करने के लिए सख्त कार्रवाई कर दी। पवन के आदेश दिया कि कुछ करो। आदेश पर अमल हुआ। दो घंटे बाद राजस्थान में कई जगह ओलों के अंबार लगे थे।

प्रकृति की यह कार्रवाई करीब तीन घंटे चली। इसके बाद पवन देवता ने अपने सारे शस्त्र समेट लिए। बादल छंट गए। शाम छह बजे तक सूरज फिर झांकने लगा था और लोग हैरान थे कि क्या ऐसा भी होता है? जो लोग गुलबंद, टोपी, स्वेटर, कोट, जैकेट, शाल, रजाई आदि अगले सीजन तक सुरक्षित रखने की तैयारी कर चुके थे, उन्हें यह कार्य स्थगित करना पड़ा, क्योंकि ओलों के कारण तापमान कम हो गया था और सर्दी लौट आई थी। जयपुर के सभी बंगलों के शानदार हरे-भरे लान उजड़े चमन बन गए थे। खेतों में फसलें आड़ी पड़ गई थीं। आम के पेड़ों के सारे बौर झड़ चुके थे और आम की फसल अच्छी होनी की संभावना पर पूर्ण विराम लग चुका था। किसानों को एक बार फिर मायूस होना पड़ा। प्रकृति की इस तरह की सख्त कार्रवाई को रोकने के इंतजाम अब तक मनुष्य नहीं कर पाया है।

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