चीन दुश्मन है या प्रतिस्पर्धी?

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का भारत और नेपाल दौरा कई कारणों से चर्चा में रहा। एक राष्ट्र के रूप में चीन की नीयत और नीति क्या है- वह शी के नेपाल में दिए एक वक्तव्य से स्पष्ट हो जाता है। वह कहते हैं, “जो कोई भी चीन के किसी भी क्षेत्र को विभाजित करने का प्रयास करेगा, वह मारा जाएगा। उसके शरीर को तोड़ दिया जाएगा और हड्डियों का पाउडर बना दिया जाएगा। यह कोई सामान्य वक्तव्य नहीं, अपितु वाम-चिंतन की वास्तविकता है- जिसका मूर्त रूप चीन में कई बार सामने आ चुका है।  वर्ष 1989 में बीजिंग स्थित थियानमेन चौक पर विरोध-प्रदर्शन कर रहे लोकतंत्र समर्थक छात्रों को वामपंथी सरकार के निर्देश पर गोलियों से भून दिया गया था और उनके मृतदेह को सैन्य टैंकों के नीचे रौंदकर लाल-लैई में परिवर्तित कर दिया। इस प्रकार की स्थिति कुछ माह से चीन द्वारा प्रशासित स्वायत्तशासी हांगकांग में भी बन रही है, जहां लोकतंत्र समर्थकों को शी सरकार बल से दबाने का प्रयास कर रही है।

चीन के मुख्यभूमि स्थित शिनजियांग प्रांत में मुस्लिम समुदाय पर शी शासन का उत्पीड़न किसी से छिपा नहीं है। वहां मुस्लिमों न केवल कुरान-नमाज पढ़ने, अपितु इस्लामी नाम या दाढ़ी-मूंछ रखने की सख्त मनाही है। साथ ही में जबरन मुस्लिमों को एक शिविर बनाकर इस्लाम की निंदा करने और वामपंथ के प्रति निष्ठ दिखाने के लिए बाध्य किया जा रहा है। हास्यास्पद तो यह है कि वही चीन अक्सर भारत को कश्मीर में मानवाधिकारों को लेकर प्रवचन देता रहता है।

इस पृष्ठभूमि में भारतीय वामपंथी चिंतकों का समूह का रवैया भी दिलचस्प है। चीन की उपरोक्त घटनाओं पर चुप रहने वाला वाम-कुनबा गत दिनों कश्मीर में सुरक्षा कारणों से मोबाइल सेवा बंद किए जाने से एकाएक व्यथित हो उठा। अब जो वाम-जमात घाटी में अल्पकाल हेतु मोबाइल सेवा बंद करने को मानवाधिकारों का हनन बता रहा है, उसकी संवेदनाएं 1990 के दशक में मजहबी अभियान के बाद घाटी से पलायन के लिए विवश हुए कश्मीरी पंडितों के लिए 30 वर्ष बाद भी जागृत नहीं हो पाई है। सोचिए, कहां 30 दिन मोबाइल विहीन होने का कष्ट और कहां 30 वर्षों से अपने देश में निर्वासितों की तरह जीवन व्यतीत करने का दंश। क्या इन दोनों की कोई तुलना हो सकती है?
यदि हमें भारत-चीन के बनते बिगड़ते संबंधों की विवेचना करनी है, तो इस साम्यवादी देश के सभी पहलुओं को देखना होगा।

क्या चीन- भारत का एक सामान्य पड़ोसी राष्ट्र अथवा प्रतिद्वंदी है या फिर भेड़ की खाल में छिपा भेड़िया है- अर्थात् शत्रु है, जो भारत को निगलना चाहता है? पं.नेहरु के दौरे में लगाए गए “हिंदी-चीनी भाई-भाई” नारे से लेकर अबतक चीन के साथ संबंधों में कई उतार-चढ़ाव आए है। चाहे 1962 का युद्ध हो, 58 अरब डॉलर का व्यापारिक घाटा, चीन द्वारा भारत की “घेरेबंदी” हो, पंगू पाकिस्तान और इस्लामी आतंकियों को वैश्विक प्रतिबंध से बचाना, सुरक्षा परिषद की सदस्यता में बाधक बनना हो या फिर सीमा विवाद। पिछले सात दशकों में इस प्रकार की घटनाओं ने दोनों देशों के रिश्तों को कुछ यूं ही परिभाषित किया है। भारत-चीन के व्यापारिक और सभ्यतागत संबंध सदियों पुराने है। इसका प्रमाण गत सप्ताह (11-12 अक्टूबर) दोनों देशों के बीच हुई दूसरी अनौपचारिक बैठक से हो जाता है, जिसका आयोजन तमिलनाडु के उस ऐतिहासिक क्षेत्र महाबलीपुरम में हुआ, जो सातवीं शताब्दी में हिंदू पल्लव राजवंश का प्रमुख बंदरगाह हुआ करता था और भारत-चीन का व्यापारिक केंद्र। इसी भूखंड से पुरातत्विदों को दो हजार वर्ष पुराने चीनी सिक्के भी मिले है, जो प्रमाणित करने हेतु पर्याप्त है कि प्राचीनकाल से भारत-चीन के व्यापारिक संबंध कितने प्रगाढ़ थे।

भारत की प्राचीन संस्कृति और परंपराओं के संबंध में, जो जानकारियां आज सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है, उसके विवरण का एक भाग सदियों पहले भारत आए चीनी यात्रियों के वृतांत से प्राप्त हुआ है। इन्हीं में फाह्यान, शुंहयुन, इत्सिंग और ह्वेनसांग आदि प्रमुख है। ये ह्वेनसांग ही थे, जो भारत भ्रमण के समय पल्लव शासनकाल में कांचीपुरम और महाबलीपुरम गए थे। उन्होंने बौद्ध धर्मग्रंथों का संस्कृत से चीनी अनुवाद किया और चीन में बौद्ध चेतना का विस्तार किया। यही कारण है कि आज चीन में नन्हाई बुद्ध विश्वविद्यालय है, जो वर्ष 1193 में मुस्लिम आक्रांता बख्तियार खिलजी द्वारा जमींदोज प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय का प्रतिरुप है। बुद्ध समुदाय के 24 करोड़ लोग चीन में बसते है, जिनके आराध्य और पूज्य भगवान गौतमबुद्ध ने अपने जीवनकाल में भारत से ही विश्व को शांति का संदेश और ज्ञान का प्रकाश दिया था।

चीन स्वयं को एक अजेय सभ्यता और विश्व का नेतृत्व करने वाले ताकत के रूप में देखता है। इस दिशा में उसने अपनी शिक्षा पद्धति और मानव-व्यवहार में प्राचीन दर्शनशास्त्र, सांस्कृतिक और राजनीतिक विचारों को मजबूती के साथ स्थापित किया है, जिससे वहां के स्थानीय निवासी अपनी मूल जड़ों से जुड़े रहते है। कालांतर में उस कुटिल साम्राज्यवादी मानसिकता का भी जन्म हुआ, जिसमें दूसरे देशों की जमीनी और समुद्री सीमाओं पर अतिक्रमण करने का भी दर्शन है।

वर्ष 1962 के युद्ध में भारत की शर्मनाक पराजय से लेकर 2017 के डोकलाम घटनाक्रम में भारत की कूटनीतिक विजय की पृष्ठभूमि में- मैं चीन को पाकिस्तान जैसा विशुद्ध शत्रु राष्ट्र नहीं मानता हूं। इसका स्पष्ट कारण है कि भारत के प्रति पाकिस्तानी सत्ता अधिष्ठान का वैचारिक चिंतन ‘काफिर-कुफ्र’ अवधारणा की नींव पर आधारित है, जिसमें इस्लाम पूर्व सभ्यता, संस्कृति, परंपराओं और गैर-मुस्लिमों के प्रति घृणा है।  प्रतिकूल पाकिस्तान के, चीन- भारत की भांति प्राचीन सभ्यता होने के अतिरिक्त स्वभाव से महत्वकांशी, परिश्रमी और प्रतिस्पर्धी है। भारत और चीन की वर्तमान जनसंख्या क्रमश: 136 करोड़ और 144 करोड़ है। अर्थात विश्व की कुल आबादी (770 करोड़) का 36.3 प्रतिशत (280 करोड़) है, जो दोनों को मौजूदा समय में निवेश हेतु दुनिया के सबसे बड़े बाजार के रूप में स्थापित करते है। इस संदर्भ में चीन, भारत से कहीं बेहतर स्थिति में है।

वास्तव में, भारत-चीन अपने खोए हुए वर्चस्व को प्राप्त करना चाहते है। ब्रितानी आर्थिक इतिहासकार एंगस मेडिसन ने अपनी पुस्तक “कॉन्टुअर्स ऑफ द वर्ल्ड इकॉनामी 1-2030 एडी” में स्पष्ट किया है कि पहली सदी से लेकर 10वीं शताब्दी तक भारत विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी। बेल्जियम अर्थशास्त्री पॉल बरॉच के अनुसार, 1750 की वैश्विक अर्थव्यवस्था में जहां चीन की हिस्सेदारी 33 प्रतिशत थी, वही भारत 24.5 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर था। यह बात अलग है कि ब्रितानी शासन में भारतीय अर्थव्यवस्था का जमकर दोहन हुआ।
भारत ने 15 अगस्त 1947 को ब्रितानी साम्राज्यवाद से मुक्ति पाई, तो चीन में अक्टूबर 1949 को माओ से-तुंग के नेतृत्व में साम्यवादी राज्य-व्यवस्था का उदय हुआ। किंतु कालांतर में माओ के वाम-चिंतन ने चीन में मानवीय त्रासदी का रूप ले लिया। उनके शासनकाल में जहां लाखों-करोड़ों विरोधियों और उनसे असहमति रखने वालों की हत्या करवा दी गई, तो उनकी नीतियों ने 4 करोड़ जिंदगियां तबाह कर दी।
माओ की हिंसक सांस्कृतिक क्रांति और साम्यवादी विचारों का ही परिणाम था कि 1970 के दशक में चीनी अर्थव्यवस्था का संकट गहरा गया। 1976 में माओ की मृत्यु के पश्चात चीनी राजनीतिक अधिष्ठान समझ गया कि उसका समाजवाद कालबह्यी हो चुका है। परिणामस्वरूप, देंग-शियाओ-पिंग ने एकसाथ कई क्षेत्रों में सुधार कार्यक्रम प्रारंभ किए, जिसके अंतर्गत चीन में मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था की नींव रखी गई। इस परिवर्तित व्यवस्था के चरित्र में चार दशकों से चीनी विशेषता युक्त समाजवाद का दर्शन- अर्थात्, राजनीति में वामपंथी अधिनायकवाद, तो अर्थव्यवस्था में चीन के राष्ट्रीय हितों को समर्पित पूंजीवाद है। शी जिनपिंग भी उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।

इस पृष्ठभूमि में भारत की स्थिति क्या है? हमारा देश एक जीवंत लोकतंत्र है, जहां सभी नागरिकों को समान संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। किंतु इनमें से कुछ, जो स्वयं को वाम-उदारवादी, प्रगतिशील और सेकुलर कहते है- वह अक्सर उन्हीं संवैधानिक अधिकारों का दुरुपयोग कर कभी पर्यावरण के नाम पर, तो कभी अन्य कारणों से राष्ट्र की विकास यात्रा में अवरोधक बन जाते है या फिर भारत की छवि को कलंकित करने लगते है। भारत-चीन के बीच 58 अरब डॉलर के व्यापारिक-असंतुलन के लिए क्या केवल चीन जिम्मेदार है? भारत में चीन से आयात होने वाले अधिकतर वस्तुओं के लिए किसी रॉकेट विज्ञान की आवश्यकता नहीं है, जिसका निर्माण हमारे देश में असंभव हो। दीपावली के समय अधिकतर घरों को रौशन करने वाली बिजली की लड़ियों से लेकर लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां तक आज चीन से आयात होती है। क्यों?
निसंदेह, हमें चीन की ओर से प्रत्येक खतरे के प्रति सजग और सचेत रहने की आवश्यकता है।

परंतु सच यह भी देश में वामपंथी विचार से प्रभावित होकर हमनें अपनी कर्मशक्ति का ही ह्रास किया है। बजाय भारत को स्वावलंबी बनाने या फिर कर्मशक्ति के लिए लोगों को प्रोत्साहित करने के, अधिकतर राजनीतिक दलों में होड़ इस बात को लेकर है कि लोकलुभावन योजनाओं के अंतर्गत, किसने और कितनी सीमा तक मुफ्त में दाल-आटा, बिजली-पानी दिया और कर्ज माफ किया। क्या यह सत्य नहीं कि चीन आयातित वस्तुओं की हमारे द्वारा खरीदारी से चीन में नौकरियां पैदा होती है? इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि संपन्नता भी वही है। क्यों नहीं हम प्रतिस्पर्धा के युग में चीन के समक्ष टिक नहीं पाते? क्या हम सभी को इस पर आत्मचिंतन करने की आवश्यकता नहीं?

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