सेलिब्रिटी से क्यों पसंद-नापसंद तय हो?

पूर्व क्रिकेटर कपिल देव और फिल्मकार गोविंदा व रवि किशन को वडोदरा की एक उपभोक्ता अदालत ने करीब आठ लाख रुपए हर्जाने के तौर पर देने का आदेश दिया है। उनके फोटो का इस्तेमाल करके एक दंपत्ति ने ‘सनस्टार क्लब’ खोला और एक लाख बीस हजार रुपए से लेकर तीन लाख रुपए तक में उसकी सदस्यता बेची। बाद में फ्राड सामने आने पर ठगे गए। अट्ठारह लोगों ने उपभोक्ता अदालत की शरण ली। अदालत ने फ्राड में तीनों सेलिब्रिटी की जिम्मेदारी भी मानी और प्रत्येक को हर पीड़ित को पंद्रह-पंद्रह हजार रुपए देने की निर्देश दिया।
यह पहला मौका नहीं है जब किसी सेलिब्रिटी के दावों के झांसे में आकर लोग ठगे गए। कुछ साल पहले गोरा करन वाली क्रीम का प्रमोशन करने वाले शाहरुख खान को फटकार मिली थी। कंपनी पर जुर्माना भी हुआ लेकिन सेलिब्रिटी द्वारा किसी भी उत्पाद की खूबियां बढ़-चढ़ कर दिखाने वाली प्रवृत्ति पर कोई रोक नहीं लग पाई है।

किस आरो से साफ हुआ कौन सा पानी पीना स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद है? किस क्रीम से काला रंग जल्दी गोरा हो सकता है? कौन सा पेस्ट शुद्धता की गारंटी देता है? बच्चों का उचित विकास किस पेय से हो सकता है? सवालों की लिस्ट काफी लंबी है मसलन किस साबुन से हाथ धोना चाहिए, क्या पहनना चाहिए, क्या और कैसे खाना चाहिए वगैरह वगैरह। अलग-अलग इलाकों में किसी खास दिन लगने वाले साप्ताहिक बाजारों में अपनी जरूरत की चीजों को चुनना आमजन के लिए मुश्किल नहीं है। मोल भाव का विकल्प उसके पास होता है। बाजार से खाली हाथ लौटने पर भी उसके मन में हीनभावना नहीं आती। पिछले कुछ समय से औसत मध्यम वर्गीय परिवार की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। ऑन लाइन खरीदारी का शौक बढ़ा है। पर समाज के इस विशेष क्रय शक्ति वाले इस वर्ग लिए भ्रम का एक नया जाल पिछले कुछ समय में बुन दिया गया है। यह किया है टीवी के परदे ने जो इस वर्ग का सबसे करीब परिजन या मित्र बन गया है।

रोज सिर पर मानो हथौड़ा मारते हुए टीवी विज्ञापनों के जरिए बताता है और स्टारों के मुस्कुराते चेहरों के साथ समझाता है कि लोग कैमिकल फैक्ट्री में बना 18 रुपए वाला नमक खाकर बीमार न पड़ें बल्कि 99 रुपए वाला शुद्ध नमक खाएं। पेस्ट, खाने के तेल, बिस्किट, चाकलेट, दूध-आटा आदि में सबसे शुद्ध क्या अपनाए। शुद्धता प्रमाणित करने की इस होड़ में अलग-अलग स्टार अपने अंदाज में जम कर आपाधापी कर रहे हैं और बेचारे उपभोक्ता उलझन में हैं कि वे किसकी सलाह मानें?

सवाल सिर्फ शुद्धता का नहीं है, उत्पाद की तारीफ में पढ़े जाने वाले कसीदे की विश्वसनीयता मापने का भी है। कुछ समय पहले अभिनेता अभय देओल ने फेसबुक पर उन स्टारों को जम कर लताड़ा था जो किसी उत्पाद की खूबियां बढ़ चढ़ कर बखान करते हैं। 2015 में फास्ट फूड ‘मैगी’ की गुणवत्ता पर सवाल उठाने के बाद उस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। उसे विज्ञापनों में सर्वश्रेष्ठ बताने वाले स्टारों की खासी छीछालेदर हुई। लेकिन बदला कुछ नहीं। खेल, फिल्म या अन्य किसी क्षेत्र से जुड़ी हस्ती का किसी उत्पाद को श्रेष्ठता का प्रमाण पत्र देने का सिलसिला थमा जारी है।
मूल मुद्दा यह है कि विभिन्न क्षेत्र की सेलिब्रिटी लोगों से जिन उत्पादों को खरीदने की वकालत करती है उनके स्तर या गुणवत्ता अगर कोई दोष पाया जाए तो उसके लिए उन्हें जिम्मेदार क्या नहीं ठहराया जाना चाहिए। कुछ समय पहले विवाद एक बिल्डर फर्म ‘आम्रपाली’ को लेकर उठा और उसमें निशाने पर आ गए क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी। धोनी इस रियल एस्टेट फर्म के पिछले करीब साल साल से ब्रांड एंबेसडर थे। ‘आम्रपाली’ के होर्डिंग्स में पहले वे अकेले और फिर पत्नी के साथ नजर आते रहे।

फर्म के एक आवासीय प्रोजेक्ट में हो रही देरी से नाराज लोगों ने धोनी पर इसके लिए सवाल दागे। धोनी को आश्वासन देना पड़ा कि वे उनकी समस्या हल करने के लिए फर्म से बात करेंगे। समाधान यह निकला कि धोनी ने ‘आम्रपाली’ से नाता तोड़ लिया। हालांकि कहा यह गया कि मामले में उनका नाम घसीटे जाने से उनकी इमेज को जो नुकसान हो रहा था उससे बचने के लिए आपसी सहमति से यह फैसला हुआ। यह मामला तो रफा-दफा हो गया लेकिन फिर भी यह सवाल बना रहा आखिर किसी उत्पाद को एनडोर्स करने के एवज में मोटी रकम पाने वाली सेलिब्रिटी को क्या उसकी गुणवत्ता या ईमानदारी की गारंटी नहीं लेनी चाहिए?

क्रीम से लोगों को काले से गोरा बनाने का दावा करने की वजह से खासे विवादास्पद हुए शाहरुख खान इससे सहमत नहीं है। फिल्मों से ज्यादा कमाई उन्हें विभिन्न उत्पादों के विज्ञापन से होती है। विभिन्न चैनलों पर जितने समय उनकी फिल्में आती हैं उससे दुगने ज्यादा समय उनका चेहरा विज्ञापनों में दिखता है। दर्जनों एड फिल्मों में वे विभिन्न उत्पादों के गुण बताते दिखते हैं लेकिन उन गुणों के पीछे कोई दोष निकल आए तो उसके लिए खुद को जिम्मेदार मानने को कतई तैयार नहीं हैं। उनका तर्क है कि हर उत्पाद को वे खुद देख परख नहीं सकते। यह ठसक इसलिए है क्योंकि भ्रामक विज्ञापन की जिम्मेदारी उन पर कभी डाली नहीं गई। परखने की जहमत शाहरुख ही नहीं कोई भी सेलिब्रिटी नहीं उठाता। इस बात को स्वीकार करने में भी उन्हें कोई संकोच नहीं होता कि जिन उत्पादों को वे लोगों के लिए बेहद गुणकारी बताते हैं उन्हें खुद कभी इस्तेमाल नहीं करते।

कभी-कभार धोखाधड़ी के आरोप में घिरने के बाद भी कम से कम फिल्मी सितारों में शर्मिंदगी का कोई भाव आया हो और उसके बाद एनडोर्समेंट करने में उन्होंने कोई विशेष सावधानी बरती हो, ऐसा सुनने में नहीं आया। 2015 में मैगी के खाद्य सुरक्षा मानकों के अनुरूप न पाए जाने पर उसके ब्रांड एंबेसडर अमिताभ बच्चन और मेगी को पौष्टिक आहार के रूप में प्रचारित करने वाले विज्ञापनों में इठलाती दिखीं माधुरी दीक्षित और प्रीति जिंटा के खिलाफ अदालती आदेश आया।

बिहार में मुजफ्फरपुर के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने इन तीनों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और जरूरत पड़ने पर उन्हें गिरफ्तार करने का आदेश दिया। कानूनी रूप से तीनों को दोषी माना गया था। लेकिन हुआ कुछ नहीं। उलटे मैगी पर से प्रतिबंध हटने के बाद कई और सितारे मैगी को शानदार बताने की मुनादी पीटने लगे।

इस मामले में महेंद्र सिंह धोनी ने मजबूरी में ही सही अपनी जिम्मेदारी स्वीकार कर एक अच्छी पहल तो की। सोशल मी़डिया पर छिड़े अभियान से हुई छीछालेदर के बाद उनके सामने और कोई विकल्प भी नहीं था। विवाद आम्रपाली ग्रुप के नोएडा वाले सफायर प्रोजेक्ट को लेकर गरमाया। कंपनी ने नोएडा के सेक्टर 45 में चालीस हजार वर्ग मीटर क्षेत्र में ग्यारह टावर में एक हजार फ्लैट बनाने का प्रोजेक्ट 2009 में शुरू किया था। सात साल बाद भी उनमें बुनियादी सुविधाओं के पूरा न होने पर सात खरीददारों ने ट्विटर पर अपनी नाराजगी जताई। उन्होंने धोनी से इस मामले में हस्तक्षेप करने को तो कहा ही, व्हाट्स एप ग्रुप ‘हल्लाबोल’ व फेस बुक के जरिए अन्य लोगों को भी इस अभियान से जोड़ा। 35 लाख लोगों की प्रतिक्रिया आई।

कंपनी का अपना तर्क था लेकिन इस अभियान के बाद धोनी ने ‘आम्रपाली’ से नाता तोड़ लिया। यह इसलिए भी जरूरी हो गया था क्योंकि ‘आम्रपाली’ ने 2011 में विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता जीतने वाली टीम के हर सदस्य को एक विला देने का जो एलान किया था, वह भी पूरा नहीं किया गया था। बहरहाल, इस प्रकरण के बाद अन्य बिल्डर फर्म के प्रोजेक्ट में हो रही देरी के खिलाफ भी आवाज उठनी शुरू हो गई और खरीदारों के हितों की सुरक्षा के लिए कानून बन गया। लेकिन सवाल सिर्फ आवासीय प्रोजेक्ट का नहीं है। उन तमाम उत्पादों का है जिनकी खूबी को बखान करते सेलिब्रिटी उन्हें इस्तेमाल न करने वालों को जीवन व्यर्थ होने का अहसास कराते हैं।

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