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भुगतान संतुलन का संकट

पिछले वित्त वर्ष में सिर्फ एक महीना युद्ध से प्रभावित था। बाकी समय जो हुआ, उससे साफ है कि समस्या की जड़ें निवेश के नए ट्रेंड और भारतीय अर्थव्यवस्था में निवेशकों के घटते भरोसे से है।

डॉलर बचाने के लिए सरकारी हलकों में क्यों इतनी बेचैनी फैली है, इसका राज़ भारतीय रिजर्व बैंक ने बताया है। आरबीआई की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक 2025-26 में भारत का भुगतान संतुलन 30.8 बिलियन डॉलर घाटे में रहा। सरल भाषा में इसका अर्थ है कि गुजरे वित्त वर्ष में भारत में जितना डॉलर आया, उससे 30.8 बिलियन अधिक डॉलर बाहर गया। ऐसा पूंजीगत खाते पर बढ़े दबाव के कारण हुआ। 2023-24 में विदेशी निवेश, विदेशी ऋण, संपत्ति हस्तांतरण आदि के जरिए 89.4 बिलियन डॉलर भारत आए थे। इस कारण चालू खाते के लगभग 27 बिलियन डॉलर के घाटे के बावजूद भुगतान संतुलन 63.7 बिलियन डॉलर लाभ में रहा।

2024-25 में पूंजीगत खाते में सिर्फ 16.6 बिलियन डॉलर का लाभ रहा। इस कारण भुगतान संतुलन तकरीबन 13 बिलियन डॉलर माइनस में चला गया। 2025-26 में पूंजीगत खाते में लाभ सिर्फ सात करोड़ 20 लाख डॉलर का रहा। उधर चालू खाते में घाटा बढ़ा। नतीजतन, भुगतान संतुलन का घाटा बढ़ गया। इससे साफ है कि पिछले दो वित्त वर्षों में भारत में डॉलर आने की दर तेजी से गिरी है। अतः इस समय जो संकट आया है, उसका कारण सिर्फ ईरान युद्ध नहीं है। पिछले वित्त वर्ष में सिर्फ एक महीना (मार्च) युद्ध से प्रभावित था।

बाकी महीनों में जो हुआ, उससे पुष्टि होती है कि ना सिर्फ विदेशी निवेश का आना कम हो गया है, बल्कि विदेशी निवेशक बड़ी मात्रा में भारत से अपना धन निकाल ले गए हैँ। 2025-26 में उन्होंने जितना निवेश भारत में किया, उससे 4.3 बिलियन अधिक डॉलर वे यहां से बाहर ले गए। उधर भारतवासियों में विदेश में अपने धन के निवेश बढ़ा ट्रेंड है। सोने के आयात में तेज बढ़ोतरी और युद्ध शुरू होने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल/ गैस तथा अन्य आयातित वस्तुओं की कीमत में उछाल से समस्या और गहरा गई है। अतः युद्ध खत्म होने से कुछ राहत मिलेगी, लेकिन बुनियादी दिक्कतें दूर नहीं होंगी। उनकी जड़ें निवेश के नए ट्रेंड और भारतीय अर्थव्यवस्था में घटते भरोसे से है। फिलहाल, ऐसा नहीं लगता कि सरकार के पास इसके समाधान की अंतर्दृष्टि है।

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