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चेहरे नए, रास्ता पुराना

लेफ्ट पार्टियों

सीपीएम के नए महासचिव ने अपनी प्राथमिकताओं का जो क्रम बताया है, उसे समस्याग्रस्त माना जाएगा। इससे संकेत मिलता है कि पार्टी श्रमिक वर्गों के संगठन और संघर्ष के ऊपर चुनावी राजनीति के तकाजों को सर्वोच्च प्राथमिकता देना आगे भी जारी रखेगी।

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने तकरीबन दो दशक से ज्यादा समय बाद ऐसे चेहरे तो महासचिव चुना है, जो अकादमिक पृष्ठभूमि के नहीं हैं और जिनका कार्यक्षेत्र राष्ट्रीय राजधानी नहीं रहा है। एमए बेबी केरल की राजनीतिक धूल-धक्कड़ से उभरे नेता हैं। उनके अलावा आठ नए चेहरे पॉलितब्यूरो और 30 नए नाम सेंट्रल कमेटी में शामिल हुए हैं। यह सब संभवतः इसलिए हो पाया कि तीन साल पहले कुन्नूर में हुई पार्टी कांग्रेस (महाधिवेशन) में नेताओं के इन पदों पर रहने की उम्र 75 साल तय कर दी गई थी। बहरहाल, पार्टी ने कभी गहरा आत्म-निरीक्षण किया, तो संभवतः उसे अहसास होगा कि राजधानी केंद्रित अकादमिक पृष्ठभूमि के नेतृत्व ने उसकी जड़ों और उसकी सियासी भूमिका को कमजोर करने में बड़ी भूमिका निभाई।

यह दौर पार्टी पर सोशल डेमोक्रेटिक रुझानों के हावी होने का रहा है। अब हालांकि पार्टी नेतृत्व में अनेक नए और अपेक्षाकृत युवा चेहरे शामिल हुए हैं, मगर पार्टी ने जो प्राथमिकताएं तय की हैं, उनसे संकेत नहीं मिलता है कि उसने उस रास्ते पर पुनर्विचार किया है, जिस पर चलते हुए वह केरल के अलावा बाकी देश में अप्रसांगिकता के कगार पर पहुंच गई है। एमए बेबी ने पार्टी की तीन प्राथमिकताएं बताईः नरेंद्र मोदी की “नव-फासीवादी” सरकार के खिलाफ अधिकतम राजनीतिक एकता का हिस्सा बनना, सामाजिक स्तर पर संघर्षों में शामिल होना, और श्रमिक वर्गों के संघर्षों को आगे बढ़ाना। किसी कम्युनिस्ट पार्टी के संदर्भ में प्राथमिकता के इस क्रम को समस्याग्रस्त माना जाएगा।

इससे संकेत मिलता है कि पार्टी श्रमिक वर्गों के संगठन और संघर्ष के ऊपर चुनावी राजनीति के तकाजों को सर्वोच्च प्राथमिकता देना आगे भी जारी रखेगी। यह आसान रास्ता है। मगर इस रास्ते से मोनोपॉली पूंजी समर्थित भाजपा- आरएसएस के हिंदुत्व के एजेंडे को परास्त करने की बात दूर की कौड़ी साबित हुई है। हिंदुत्व की विचारधारा ने सत्ता के विभिन्न केंद्रों और जन मानस के बड़े हिस्से में पर अपना वर्चस्व कायम कर लिया है। इससे संघर्ष के लिए राजनीति में सक्रियता का अर्थ बदलने की जरूरत है। सीपीएम की 24वीं राष्ट्रीय कांग्रेस ऐसी दृष्टि दिखा पाने में नाकाम रही है।

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