इसरो अब बस वह ज्ञान एवं इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करेगा, जिसका उपयोग निजी कंपनियां करेंगी। यह कम बड़ी विडंबना नहीं है कि इसरो के बारे में इतनी बड़ी घोषणा एक निजी कंपनी के चेयरमैन ने की है!
प्राइवेट सेक्टर उच्च तकनीक सहित हर क्षेत्र में कदम रखे और प्रतिस्पर्धा करे, यह उचित नीति है। लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र की प्रतिष्ठित कंपनी उसे ना सिर्फ लंबे समय में कड़ी मेहनत से विकसित अपनी तकनीकें सौंप दे, बल्कि उसके हित में मैदान खाली करने के लिए अपने उद्यम भी समेट ले, यह गलत एवं आपत्तिजनक होगा। नरेंद्र मोदी सरकार देश की शान समझे जाने वाले भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के मामले में ऐसा ही कर रही है। निजी क्षेत्र की कंपनी इन-स्पेस ने पिछले दिनों अपना रॉकेट लॉन्च किया, तो उसे देश की उपलब्धि समझा गया। अब उसी कंपनी के चेयरमैन पवन गोयनका ने एलान किया है कि आगे से इसरो प्रक्षेपण यान या आम उपग्रहों का निर्माण बंद कर देगा। यह काम निजी क्षेत्र को सौंप दिया जाएगा।
इसके बाद इसरो का कार्य सिर्फ अनुसंधान, वैज्ञानिक मिशन, एवं उन्नत अंतरिक्ष इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण रह जाएगा। इस बयान में अंतर्निहित है कि सार्वजनिक धन से इसरो वह ज्ञान एवं बुनियादी ढांचा तैयार करेगा, जिसका उपयोग इन-स्पेस जैसी कंपनियां करेंगी। यह कम बड़ी विडंबना नहीं है कि सार्वजनिक प्रतिष्ठान के बारे में इतनी बड़ी घोषणा एक निजी कंपनी के चेयरमैन ने की है! उन्होंने यह पुष्टि भी की कि इसरो अपनी 120 तकनीकें निजी क्षेत्र को हस्तांतरित कर चुका है। पिछले महीने ये सनसनीखेज खबर आई कि इसरो के लगभग 120 वैज्ञानिकों ने या तो प्री-मैच्योर रिटायरमेंट ले लिया, यह इस संगठन से नाता तोड़ लिया है।
तब अनुमान लगाया था कि इस घटनाक्रम का संबंध भी अंतरिक्ष क्षेत्र के हो रहे निजीकरण से है। इस संबंध में यह बात अवश्य ध्यान में रखनी चाहिए कि जिन देशों में निजी क्षेत्र के अंतरिक्ष अभियानों ने ऊंचाइयां भरी हैं, वहां भी सार्वजनिक क्षेत्र की एजेंसी की प्रमुख भूमिका बनाए रखी गई है। दरअसल, किसी क्षेत्र में सार्वजनिक उद्यमों के कमजोर होने का मतलब अक्सर उसमें मोनोपॉली कायम होने के रूप में सामने आता है। यह प्रक्रिया अनुसंधान, आविष्कार, एवं व्यापक हित वाले विकास के लिए हानिकारक होती है। मगर, लगता है कि नरेंद्र मोदी सरकार का ऐसे आम तजुर्बों से कोई लेना-देना नहीं है।
