हाल में संकेत मिले कि सत्ता पक्ष का नैरेटिव कंट्रोल टूट रहा है। उस नियंत्रण को वापस पाने के हालिया प्रयास कारगर नहीं हुए। तो अब संभवतः सरकार की शक्ति के इस्तेमाल की रणनीति बनी है।
भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने बीते आठ अक्टूबर को सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को एडवाइजरी भेजी। इसमें कहा गया था कि वे दिल्ली में चल रहे राजनीतिक आंदोलनों के सिलसिले में “भ्रामक, पुरानी या संदर्भ से अलग” सामग्रियों पर “कड़ी निगरानी” रखें। उसके बाद दस अक्टूबर को मंत्रालय ने सोशल मीडिया कंपनी मेटा को अलग निर्देश भेजा। उसमें फेसबुक और इंस्टाग्राम के कंटेंट रिकमेंडेशन सिस्टम (एल्गोरिदम) पर सवाल उठाया गया। कुल मिलाकर सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स को आगाह किया गया है कि उन पर एकतरफा नैरेटिव जा रहा है, जिसे उन्हें नियंत्रित करना चाहिए। मंत्रालय ने कहा कि एल्गोरिदम ऐसा होना चाहिए, जिससे यूजर्स को किसी भी मुद्दे पर एकतरफा जानकारी या सीमित नैरेटिव ना मिले। अब सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने टीवी चैनलों को प्रसारण संबंधी नियमों का सख्ती से पालन करने को कहा है।
अपनी एडवाइजरी में मंत्रालय ने कहा कि बहस के लिए गेस्ट के चयन में सावधानी बरती जाए और जरूरत पड़ने पर चैनलों को टिप्पणियां म्यूट करने, चेतावनी दिखाने, डिस्क्लेमर लगाने या प्रसारण रोकने जैसे कदम उठाने चाहिए। सरकार ने आगाह किया है कि केबल टेलीविजन नेटवर्क्स अधिनियम-1995 और उससे जुड़े प्रोग्राम कोड के उल्लंघन पर कार्रवाई की जा सकती है। संदर्भ सामान्य हो, तो इन परामर्श-पत्रों को सरकार के सामान्य कर्त्तव्य निर्वहन के रूप में समझा जाता। लेकिन फिलहाल जो पहल हुई है, उसे मौजूदा परिस्थितियों से अलग करके नहीं देखा जा सकता। आम समझ बनी है कि कॉकरोच आंदोलन के उदय ने देश में राजनीतिक विमर्श को बदल दिया है। अपेक्षाकृत संपन्न घरों से आए नौजवानों ने ऐसी तीखी और “अ-शालीन” शब्दावली को आम बना दिया, जिससे माहौल बदला और सत्ता पक्ष एवं उसके नेताओं के लिए तब तक “अनकही” बातें खुल कर कही जाने लगीं। इससे संकेत मिला कि सत्ता पक्ष का नैरेटिव कंट्रोल टूटने लगा है, जो उसकी राजनीतिक शक्ति का प्रमुख आधार रहा है। उस नियंत्रण को वापस लाने के प्रयास पहले हुए, लेकिन वे कारगर नहीं हुए। तो अब संभवतः सरकार की शक्ति का इस्तेमाल करने की रणनीति बनी है। लेकिन बदले माहौल में इसकी कामयाबी भी संदिग्ध है।
