लॉरेंस बिश्नोई के मामले में उचित यही होगा कि भारत अपनी न्याय प्रक्रिया के तहत आरोपियों पर मुकदमा चलाने के रुख पर कायम रहे। अमेरिकी ‘हार्ड बॉल’ के आगे नरम पड़ना उचित नहीं होगा।
अमेरिका के न्याय मंत्रालय ने गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई और पंजाब के पुलिस इंस्पेक्टर गुरिंदरजीत सिंह सहित 37 व्यक्तियों पर विभिन्न अपराधों को अंजाम देने का अभियोग लगाया है। इसके मुताबिक बिश्नोई गिरोह ने जो जुर्म किए, उनमें खालिस्तानी उग्रवादी हरदीप सिंह निज्जर की कनाडा में हत्या भी है। गुरिंदरजीत सिंह पर चार लाख डॉलर की रिश्वत देने के लिए अमेरिका स्थित एक परिवार को धमकाने का इल्जाम है। अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि 2023 से चले ऑपरेशन ‘हार्ड बॉल’ के तहत 37 आरोपियों के खिलाफ साक्ष्य जुटाए गए, जिनमें 24 को गिरफ्तार किया जा चुका है।
फरार अपराधियों में बिश्नोई का खास सहयोगी गोल्डी बराड़ भी है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक अमेरिका जल्द ही भारत से बिश्नोई और गुरिंदरजीत सिंह के प्रत्यर्पण का अनुरोध कर सकता है। फिलहाल, अमेरिकी अधिकारियों ने कहा है कि जांच में भारत ने पूरा सहयोग किया, मगर प्रत्यर्पण का मामला भारत के लिए कठिन चुनौती बन कर आएगा। एक तो अमेरिकी अधिकारियों ने खुलेआम जो कहा, उससे संकेत गया कि लॉरेंस बिश्नोई भारत की जेल (गुजरात में साबरमती) में रहते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगीन अपराधों को निर्देशित कर रहा है। इसके जरिए अमेरिका ने भारत की जेल व्यवस्था की विश्वसनीयता को संदिग्ध बनाने का प्रयास किया है। फिर पुलिस अधिकारी पर गंभीर आरोप लगाकर भारत की पुलिस व्यवस्था पर भी उसने संदेह का साया डाला है।
अब प्रत्यर्पण की बात आई, तो उससे प्रश्न उठेगा कि क्या अमेरिका भारतीय न्याय व्यवस्था को अपराधियों को दंडित करने में सक्षम नहीं मानता? चूंकि मामले में अमेरिकी एजेंसी एफबीआई भी शामिल है, तो वह बिश्नोई से पूछताछ की इजाजत चाहेगी। इस दौरान बिश्नोई से यह जानने की कोशिश की जाएगी कि जेल में रहते हुए वह इतने बड़े स्तर पर आपराधिक गिरोह का संचालन करने में कैसे कामयाब हुआ है? उसके तार किससे जुड़े हुए हैं? ये सारे प्रश्न भारत को असहज करने वाले साबित हो सकते हैं। इसलिए उचित होगा कि भारत अपनी न्याय प्रक्रिया के तहत भारत स्थित आरोपियों पर मुकदमा चलाने के रुख पर कायम रहे। अमेरिकी ‘हार्ड बॉल’ के आगे नरम पड़ना उचित नहीं होगा।
