एक व्याख्या के मुताबिक अन्य पार्टी में विलय से पहले निकले गुट के लिए खुद को असली पार्टी साबित करना अनिवार्य है। संसदीय दल मूल पार्टी का सिर्फ एक हिस्सा होता है। ‘आप’ के सांगठनिक ढांचे में कोई विभाजन नहीं हुआ है।
आम आदमी पार्टी (‘आप’) के सात राज्यसभा सदस्यों के भाजपा में मिलने की प्रक्रिया को जिस तेजी से सभापति सीपी राधाकृष्णन ने मंजूरी दी, उससे दल-बदल विरोधी कानून की साख पर गहरा बट्टा लगा है। ऐसे कुछ तकनीकी सवाल हैं, जिनकी इस निर्णय से पहले गंभीर परीक्षण की जरूरत थी। सात की संख्या सदन में दो तिहाई सदस्यों की शर्त को जरूर पूरा करती है, मगर यह भी साफ है कि ‘आप’ के विभाजन की प्रक्रिया पूरी नहीं की गई। वैधानिक प्रावधानों की एक व्याख्या यह है कि अन्य पार्टी में विलय से पहले निकले गुट के लिए असली पार्टी के रूप में खुद को साबित करना और मान्यता प्राप्त करना अनिवार्य है।
ऐसे करने की तय प्रक्रिया है, जिसकी व्याख्या सुप्रीम कोर्ट ने अतीत के कई मामलों में की है। संसदीय दल पार्टी का सिर्फ एक हिस्सा होता है, जो सदन के बाहर के सांगठनिक ढांचे से जुड़ा होता है। ‘आप’ के सांगठनिक ढांचे में कोई विभाजन नहीं हुआ है। सदन के भीतर भी दस में से सात सदस्य अलग हुए और कुछ घंटों के अंदर भाजपा में शामिल हो गए। अनेक कानून विशेषज्ञों ने राय जताई है कि संविधान की दसवीं सूची में शामिल दल-बदल विरोधी अधिनियम की भाषा और उसकी न्यायिक प्रक्रियाओं के मुताबिक ‘आप’ से अलग हुए उन सांसदों का आचरण दल-बदल माना जाएगा। इस रूप में उनकी सदस्यता खारिज होनी चाहिए। जाहिरा तौर पर ये मामला भी सुप्रीम कोर्ट के पास जाएगा।
मगर ऐसे मामलों में अक्सर न्यायिक निर्णय आने में इतनी देर लगती है कि उनका महज आगे के प्रकरणों के लिए ही महत्त्व रह जाता है। आज के दौर में जब कानून का शब्द और भावना दोनों रूपों में बेहिचक उल्लंघन हो रहा है, उसके बीच हर मामला एक नया मामला होता है और ऐसी अदालती व्यवस्थाओं की सिर्फ तकनीकी हैसियत रह जाती है। अतः सर्वोच्च न्यायालय से यह उचित अपेक्षा रहेगी कि कानून की साख की रक्षा के लिए वह निर्णय आने तक ‘आप’ से निकले सदस्यों की अवस्था को निलंबित स्थिति में रखे। तभी दल-बदल विरोधी कानून की भावना की रक्षा हो सकेगी।
